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Showing posts from July, 2020

बड़ नीक रसगुल्ला मिठाई (मित्र दिवश पर मित्र सब करें हसगुल्ला भेंट) मैथिली कविता

बड्ड नीक रसगुल्ला तों बड्ड नीक रसगुल्ला तों         अनमन जेना बौगला तों पाछां जे ठाढ़ तोहर छौ          बड्ड दीब पेनतोआ छौ।    ईमरती जिलेबी छै रसदार         मखमल  जकां  मोती चूर विना ब्रेक के  आवै जाइजो         मुंह सं  आव खसैया लाड़। मोन मे बसल रसमलाई          होइत अछि जे खूबे खाइ वाट  तकैया  चन्द्रकला           दोड़ै छी जे परा ने जाय । घेबर के त' बात  ने पुछू          खाइत रहू आ घी टपकैत नहू नहू घुलि जैत बतासा           तुरत्ते मुंह  में जा बिलैत । काजुक  बर्फी  आ श्रीखण्ड         मोहन भोग गाजरक हलुआ चूरमा मोरब्बा सोन पापड़ी            करैत  रहैया  हमरा तंग। हौ  पेड़ा  तों  नहिं  नुकाह          तोरा संग  बड्ड जुड़ल याद चारि आना...

लाल दीदी (मैथिली कविता)

लाल दीदी अनुभवी मुखमंडल प्रश्न सं भरल आंखि जेना ज्योति बहराइत टुकुर-टुकुर ताकि रहल छल  अनवरत हमरे दिश बस मे बैसल छल बाहर सं केओ बजौलकै उतर' लागल नज़रि हमरे दिश टांगल, लटकल ' नेहरू' रौ.......! नईं चिनलही ? हम अवाक । के भ' सकैत अछि मुदा छी मुग्ध 'नेहरू' जे बजौलक हम हूं उतरि गेलहुं फेर वैह प्रश्न नहिं चिनलही ? गोर लगलियै पांझि मे भरि लेलक  दुनू हाथें  दुनू गाल थपथपेलक  आंखि मे नोर  हमरो, ओकरो  अकस्मात लागल  'ई' त' मायक स्पर्श  मुदा ओ त' स्वर्गिय... तखन 'ई' के  एहन ममता, एहन दुलार  कहिया भेटल रहै  किछु स्मरण नहिं  आश्चर्यित छलहुं  कोनों सपना त' नहिं  तखने ओ बाजल  हम छियौ  "लाल" दीदी  आव चिनलही ? गला भरि गेल  स्वर मे थरथराहट  कोनों तरहें बजलहुं  हां, तीस बरस के बाद  आई देखलियौ  क्षमा करिहें  तोरा सनक नजरि जे नहिं अछि ‌‌‍‍‌ पता नहिं ई गाड़ी ‌ कत्त तक जैत  परन्तु आव  चलत सना-सन दना-दन  दुनू गाल पर  दीदीक थपथपाहट जे अछि । प्रमोद कुमार(नेहरू) पांडिचेरी

फेल भ' गेलहुं (मैथिली कविता)

मित्रगण अपनेक सेवा मे एकटा अनुभव प्रस्तुत क' रहल छी। नीक लागै या बेजै ,नि:संकोच लिखब से आग्रह।                        फेल भ' गेलहुं परीक्षाक ड्युटी छल हाॅल में पहुंचलहुं  काॅपी बांटि देलियै घंटी पड़लै प्रश्नपत्रो द' देलियै कनी दम धेलहुं          देखलियै केओ नहिं         लिख रहल छल         ब्यंग्य केलियै         आव बुझू         क्लास एटेंड नहिं कैलाक फल          कंनी कुढ़लहुं         अहिना हैत। फेर हम चुप ओहो सभ चुप, स्थिर मोन में आयल देखियौन्ह ने केहेन भोला बाबा बनल छथि जनै छथि सत्यानाश तक मूंह जे बनौने छथि जेना हिनका सभ सं मासूम केओ अछिये नहिं         अखनों सभ शांत           हमर बेचैनी बढ़ल           तखनहि एकटा पूछलक           आव लिखू?         ...

कटही गाड़ी (मैथिली कविता)

कटही गाड़ी कटही   गाड़ी   हूं   ऊं   हूं हाल  चढ़लै, बान्ह   पड़लै धूड़ा  में  छुछ  सन  घुसलै बाजि रहल अछि चूं-चूं-चूं।                    कटही गाड़ी.......... धानक बोझ लदने  जाइछी बाजे  अंग-अंग,   ची-चूं-ची बड़दक घंटी  संग-संग बाजै गृहणीक पायल छुन-छुन-छूं।                      कटही गाड़ी............. कनियां त' खरिहान निपति छथि मैंयां    ढ़कक   छेद   मुनै   छथि ढ़ेकी,  उखड़ि,   समाठ    धोवेलै चूड़ा     कुटेतै      धम -धुम -धूम                       कटही गाड़ी........... कनियां-पुतरा   सब भ'  जेतै कोठी, झप्पा  सेहो  भरि जेतै 'अन्न धन'जे आबि रहल छथि मूंसो  आव  बाजत  चूं-चें-चूं।       ...

आन्हर (मैथिली लघु कथा)

आन्हर                      (एकटा लघु कथा) चूं--चीं--धक, हल्का झटकाक संग गंगासागर एक्सप्रेस सियालदह स्टेशन पर रूकि गेल।सभ उतरनिहार। बड़ पैघ आपा-धापी।कुली सबक दौरम- दौर। अपार जनसमूह। जत' देखूं, मुंडक-मुंड।एको डेग चलब कठिन!कनियां के कहलियनि," सुखदा! कनि रूकि जाऊ।भीड़  कम हुअ' दियौ। नहिं त' कत्त' क' धकेलत, खसब आ' हाथ पैर टूटत से नहिं जानि। दुनू गोटे कात भ' क' ठाढ़ भ' गेलहुं। भीड़ छंटलै। " सुखदा "आव चलू" ।हम दुनू हाथे दूटा बैग, पहिया वाला, गुड़कबैत चललहुं।अनेकों बैग, अनगिनत हाथ, किन्तु आवाज एक्के-" घर्र घर्र, चर्र चर्र, घिस, घिस, जेना लाइन सं अनेकों कटही गाड़ी चैल जा रहल हो।सभ यात्रि एके दिशा मे आगू बढ़ैत। मुदा गंतब्य भिन्न। हमरो सभ के सांझ में 5.30बजे फ्लाइट छल। मद्रास के लेल।सोचलहुं," सियालदह टीशन पर उच्च क्लास प्रतिक्षालय में साफ-सफाई नीक छै। एयर कंडीशन सेहो छै।ओतहि जा क' कनि फ्रेश होयब, जलखै करब,सामान सभ अमानती घर में राखि, दू- चारि घंटा घुमव-फिरव,। तखन प्री पेड टैक्सी ल' एयरपोर्ट चलि जायब।घूमि क' पाछां देखलहु...

क्षुब्ध ( मैथिली कविता)

Created by DrPramod Kumar                               "क्षुब्ध" की बाजू किछु याद नईं सठिया जे गेल छी! की लिखू किछु ज्ञात नहिं मूर्ख जे बनल छी। अजुके लिय' खाय जे बैसलहुँ छप्पन परकार सभ विन्यास केओ साथ नहिं। दु:खी छलहुं फोन उठेलहुं कनि बाते क' ली जबाव भेटल अखन 'बिजी' छी! "भूत" मे पहुंचलहुं किछु ढाढ़स हैत उ गाम, उ घर आंगन आ ओसारा घैलची पर घैल पाइन लवा लव कोठी के पेट त'  "दैते" के खूनल हरदम खाली। मोड़ा मे छुछ भात हाथ कहां नमहर। ओ धनकटनी दौनी, ओसौनी भुक्खल बड़दक जुन्ना सं मुंह बान्हल ठिठुरैत कक्काक  थर थर पराती उहो त' दु:खे दैयै की? भबिष्यक सोचू ? उ त' आओर भयावह महल ओ मकान कार ओ चाकर की ने जोड़लहुं की ने अरजलहुं, कहेलहुं सभ गुण आगर लगैय' आव सभटा भुतही गाछी। आब, के बनैया लाठी के दैऐ काठी की बाजू, की लिखू क्षुब्ध भेल बैसल छी। प्रमोद कुमार पान्डीचेरी ४-११-१८ १०-०५ सुबह pramod_drpk @ yahoo.co. in

लोरी (मैथिली कविता)

लोरी       हे  यौ   बौवा    सुइत   रहू       औंठा सं अहां अमिय चुसू       चानों आव डुबल गगन  मे       तारो  सभ  भेल  उड़न- छू                          हे यौ बौवा.........!                        लक्ष्मी माता कोरा  लेती                       सरसत्ती मां गीत सुनौती                       गौड़ी मां के झूला पर जा'                       झुलैत रहूं अहां नहूं- नहूं                                 हे यौ बौवा...........!        देखियौ  कत्ते  राइत   भेलै       ...

ईमान बेचता हूं (हिन्दी व्यंग्य कविता)

ईमान बेचता हूं हां, मैं ईमान बेचता हूं रोज ही ग्राहक आते  हैं कोई मोटा, कोई पतला कोई बड़ा रसूख वाला             मैं कितना ईमानदार       किसी को नहीं लौटाता       जो जितना देता है       ले लेता हूं       वादा कर लेता हूं       ईमान बेचता हूं। उसबार तो हद ही कर दी बहुत बड़ा रकम पाया पूरे परिवार का मिलेगा भरोसा दिलाया दिया किसी और को क्या करूं गर्व करता हूं फिर भी वह देश बेचता है मैं ईमान बेचता हूं।       पिछले बार उसने कहा       पुरुषोत्तम को        आराम दिलाऊंगा       तंबू से निकाल कर       महल में रखुंगा       पहली बार ईमान न बेचा       लेकिन इस बार वादा करता हूं बड़ा बेईमान बनुंगा सभी सीमा लांघकर ईमान बेचुंगा। प्रमोद कुमार "नेहरू" पांडिचेरी दि. 15-12-2018 सायं-7-05 बजे

हत प्रभ (मैथिली कविता)

हतप्रभ गाल पर हाथ कपार पर चिंताक लकीर आंईखो डबडबायल घोर निराशा आ' पश्याताप की सोचलहुं की भ' गेल बच्चे रही बियाह भ' गेल बच्चा सभ नहिं जिबैत रहैय साउस रहथि,  मायक दोसर रुप बड्ड मानथि दैवक माया, मलेरिया खा गेलनि! आव नितांत एसगर! लोक सभ कहलकै हुनका दोसर बियाह क' लिय' मुदा नहिं विद्वान रहथि अत्यंत बिचारशील हमरे मे अपन सुख देखलनि हे दिनकर! हे दीनानाथ!!  कोख सजाउ! कोर भरू! हहाकार! चित्कार!  गुंजा दिय आंगण किलकारी सं 'अरग' चढ़ैब, 'एकादशी' करब कथा सुनब!  दिनकर सुनि लेलनि! आई आंगण भरले-पुरल नहिं                               कोंचल अछि ! बाल- गोपाल सभ सं आई जे' ऊ' रहितथि गद-गद होइतथि! ईश्वरक लीला!       पाईनभरनी नहिं अएलै आई       बर्तन- बासन सभ अईंठे       भनसिया के कहि देलियै       एगो थाड़ी धो' क'       ओही मे परोसि दियौ       बच्चा सभ खा लेतै       लिय! भ' गेलै बलाय!       तमाश...

प्यासल बादल (मैथिली कविता)

प्यासल बादल सिन्धु अरब मे जन्म लेलहुं हम प्रिय  भूमि  मे  पाओल   प्रवेश प्रिया मिलन  के  आश  सजौने पश्चिम   घाट  सं   ठानल   द्वेष           प्रिया मिलन मन संचित रहि गेल           प्रचंड  वेग  रथ  बान्हल   देखल           उदंड    समीर,  कुढ़नी   दामिनि           बाट   तकैत,  बाटहि  मे   भेटल अहिंक आदेश जानि क , प्रिय हे!  चारि मास धरि रण- वन  घुमलहुं कतहु क रिमझिम,कतहु क भारी बूंद-  बूंद   या      धार     बहेलहुं           सखि सभ के झूला पर झुलैत           गीत सुहावन  गाबति   देखल           वन बिच मोर नाचि रहल छल           मुख किसानक चमकैत देखल जड़ल दुईभ, झुलसल झड़- झांख...

चिड़ैयक चाह (मैथिली कविता)

चिड़ैयक चाह एक चिड़ैया फुनगी पर बैसल चिड़ी खोदियाबैत देह चिड़ै तकैया' दिग- दिगंत किम्हर हमर देश! युग बितल छोड़ि एलहुं अपन माइट, पाइन ओ भेष ननमुन सभ के पांईख भेलै भरलै हवा अशेष क्षितिज के छुअब अपने रंग अपने ढ़ंग मुदा सभ के एके तरंग। चिड़ै के खोंता बड़ दिबगर धनहर खेत खेनिहार कहां स्वादहीन  अन्न ओ ब्यंजन!  चलू हे चिड़ी खसले मड़ैया मे खोंता बना लेब क्यो चिन्है वा नहिं मगर वैह माइट वैह पाइन पांईख सं लगालेब रोम-रोम मे नव प्राण त' जागत! लोहारक धौंकनी हरवाहाक घुरकी चरवाहाक चुरकी सं चुबैत तेल कंसारक मुरही आंकड़  पाथर फुदुकि-फुदुकि फांकब काटि लेब जीवन शेष! प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास" पान्डिचेरी दि. 25-12-2018 ( हमर धर्म पत्नी श्रीमति कल्पना कुमारिक जन्म दिनक पुर्व संध्या पर सस्नेह भेंट)

पुष्पक गति (मैथिली कविता)

पुष्पक 'गति' अहि बेर 'ओ' पुछलनि की बनब' झट द कहलियनि फूल बना दिय' फुलबारी बसैब रंग-बिरंगक रुप धरि ललना के लहड़ैब! बुझलहुं नहिं, पर कियो झुलैत  कियो डोलैत  कियो दिनभरि गों गों क' गीते सुनैत। मूर्ति पर चढ़बै लै सेज सजबै लै जूड़ा मे गूंथै लै त केओ चिता पर  चढ़बै लै, जरबै लै वा, नहिं त'  वीरक पथ पर ओछवै लै तोरि ल' जैत। हम कानी, खिझी नहिं-नहिं, दया करु हमरा सुगंध पसारैक अछि  वायु रथ पर  चढ़ि दश-दिशा गमकबैक अछि  मुदा के सुनैया! झकझोरि तोरैया अपन पथ सं मोड़ैया  पुछितो नहिं अछि दर्दो भेल ? की सोचलहुं  आ की भ' गेल !! प्रमोद कुमार, उर्फ "नेहरू लाल दास" पांडिचेरी दि.28-12-2018 रात्रि-10.35बजे

स्वागत हे नव वर्ष (मैथिली कविता)

स्वागत हे नव वर्ष! कोयलिक कूक  गूंजै  ओहिना शहर, गाम   ओ'  घर   अंगना गाय    बहाबथि  धार  दूध  के माखन लेपथि वालक ओहिना।           मित्र बनथि सभ, शत्रु ने कोई           फरै  आम,  महुआ  खुब चूबै           खिलै फूल सभ रंग बिरंग के           हाथ   मगर  ने   लगबै  कोई। हे!  अठारह  जा  रहल छी ! याद त' बहुत  आयब  अहां मित्र बनौलहुं बहुतों अहिवेर जीत लेलहुं जेना तीन जहां।           नैं कोनों दु: ख, आ ने बाधा           आवै  ककरो  आगां- पाछा           हे! उन्नीस आऊ प्रसन्नचित           प्रेम- प्यार बहाउ एकछाहा। सुख शांति  रहै, सद्बुद्धि  बढ़ै सभ केओ सुख सं फूलै- फलै किलकारी   गूंजै   आंगन   में चहुं ओर अनुपम ज्योति जलै। प्...

एक उल्लू! दोसर उल्लू (मैथिली व्यंग कविता)

एक उल्लू! दोसर उल्लू!! उल्लू के देखलियैया' नहिं ने! कोना देखवै राइत क' निकलै छै कोटर में ,खोधर में रहै छै निहायत सुन्दर! गोल-गोल मुंह ठाढ़, छोट नाक पनिगर,चंचल आंइख पातर- पातर ठोर ताहु पर लक्ष्मिक वाहन! विधिक विधान देखू! डरल- डरल, सहमल- सहमल! कखनों कोनों डारि पर, त' कखनों कोनों मुड़ेड़ पर बेचारा! तैयो लोक ओकरा कहै छै "उल्लू" यानि...  नहिं जानि ,ओकर नाम उल्लू कियै पड़लै ,वा अर्थ खराब कियै लगलै खायर जै दियौ ऊ त' चिड़ै अछि, हर्ज नहिं। आव एमहर ताकू! देखियौ, एकटा ईहो उल्लुवे अछि कहबैया' आदमी! बड़का वंश ! आगा- पाछां, बड़का हजूम हां ,हां ठिके पकरलहुं ओहो सभ आदमिये कहबै छै! पर, मक्कार, फुसि बजवा, देश बेचवा! अनघोल मचौने अछि  मुदा करिया कोट आ' उजरा पैंट वला सभ के संरक्षण में रहैया निश्चिंत, निर्विघ्न! अपना के होनहार बुझैया' शिर्ष पर बैसै के  जोगार लगबैया! प्रमोद कुमार, उर्फ " नेहरू लाल दास" पांडिचेरी, दि. 06-01-2019 12.45PM

बड़का भैया (मैथिली कविता)

बड़का भैया गाम भरि के बड़का भैया छथि सभक दु:ख सुख में सभ सं आगां! आइ हुनकर सुखक सीमा नहिं भिनसरे सं अपसियांत बड़का पाबनि छै सभ आबि रहल छनि तीनू भाई, कनिञां, बच्चा सभ! केओ देश सं त' केओ विदेश सं कैयेक वर्ष भ' गलै  सभ के भेंट भेना दु- चारि टा बच्चा सभ के त देखबो नहिं केने छथिन एकटा भातिज, बड़का हाकिम सबके कहने फिरै छथिन! अपने यैह साइठ- पैंसठक मुदा हाड़- पांजर बैसल,डांढ़ झुकल दांतों गोटैके शेष भाई-बहिन में सभ सं जेठ पढ़ै में बड़ तेज मास्टर सभ कहथिन्ह  ई आइ .ए. एस .बनवे करत!  भावी!! पिताक स्वर्गवास ई राता- राती जुआन भ' गेलाह! ब्लाक में कर्मचारी घर चल' लगलै भाय सभ के पढ़ा-लिखा  बड़का- बड़का आदमी बनौलथि अपने ब्रह्मचारी एगो बहिन निर्मला प्यार सं 'निरू' कहथिन्ह निक घर - वर कैलखिन्ह आबि जाइन छ: मास, बरख दिन पर सासुर सं ओकरा वापिस जाय काल बड्ड कनैथ, बड़का भैया!  ओहो पौरकां.....!!! आई पावनिक तेसर दिन वापसिक तैयारी धिया- पुता जोर मारलकै फैमिली फोटो- फैमिली फोटो वेश! पहिले चारू भाय तिन टंगा कुर्सी ओही पर बैसलाह, बड़का भैया फरमान भेलै... स्माईल प्लीज! सभक मुंह पर नकली मुस्कान...

चाहक महिमा ( मैथिली हास्य कविता)

चाहक महिमा चाह पर चाह वाह भाई वाह! आगां में पकौड़ी ताहि पर सं चौप सभ केओ खाइ छथि जिनको नहिं रास चाह पर चाह वाह भाई वाह! ठोढ़ो पाकि गेल अछि  जी भेल सेहर जाड़े ठिठुरै छी बस एक्केटा आस चाहे पर चाह वाह भाई वाह! अंतड़ी सिहैर गेल जठराग्नि गेल मरि खर्चो नहिं बेसी वाह भाई वाह चाह पर चाह! चारि गोटे बैस गेलाह खाके सन सन बात सस्ते मे मुखिया हाथ में तास चाह पर चाह वाह भाई वाह! पाला पड़ै वा अवै शितलहड़ी बहुत गोटे कांपै हमरा अछि ठाठ चाहे पर चाह वाह भाई वाह! एम्हर छथि गृहणी भेल तवाह कत्ते पीता आव ई चाह पर चाह! नहिं रहै चिन्नी तैयो चाह नहिं अछि दुध तैयो वाह दिन भरि चाह बाप रौ बाप! चाह पर चाह वाह भाई वाह!! प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास" पांडिचेरी दि.11.01.2019

आ पाबनि घुमि घुमि क'आबय (मैथिली कविता)

ई पावनि घुमि- घुमि क' आवय         ( मकरसंक्रांति पर विशेष) करि स्नान दी अर्धय् दिनकर कें तिल  गुंड़ अर्पित अग्नि  देव कें लाई- चुड़लाई  तिलवा कुर-कुर फांकी   मुरही, चूड़ा   कुर-  मुर           सभ के हम त' तिल खुआवी           नहिं  ककरो पर भार चढ़ावी           नहिं  बहै  तिल चिंता नहिं हो           मात्र  हृदय  मे  जगह बनावी खिचड़ी  पर  सं  घी के धार ताहि उपर सं  पापड़ अचार महिंसी दुधक दही पावि क' धनियां चटनिक ली चटकार           ई पावनि घुमि- घुमि क' आवय           घर   समाज   में   प्रेम    बढ़ावै           सभ  के  जुड़ै तिलवा आ' लाई           वाल- वृंद   कें   गुड्डी-   लटाई! प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल...

अनबुझ बंधन ( मैथिली कविता)

अनबूझ बंधन ये कैसा बंधन था तेरा, मेरा मैं रोया,  तुम हंसी तेरे साथ ही उठा,  बैठा,  खाया और सोया भी मेला देखने गयी तुम मैं  भी चला,  पीछे पीछे पैर दुखा तेरा और दवा दिया मेरा क्यों  न समझ पाया मैं  यह अनूठा बंधन तेरा और मेरा!   कभी मैं  दिनभर भूखा रहा तुम भी नहीं  खायी कैसे जान जाती थी तुम!  कभी आधी रात को आता था मैं  तुम बराम्दे के कोने मे अकेले मिट्टी का दिया जलाकर बैठी राह देखती थी डर भी नहीं  लगा तुम्हें!  याद है तुम्हें  तुम ही परोसती थी तब मैं  खाता था  नहीं  तो नहीं  मैं  बहुत जिद्दी  जो हो गया था तेरे प्यार में!  रोटी चाहे सूखी हो या वासी मोम सी पिघलती थी  मेरे मुँह में,  पेट में!  याद है,   मैं  बीमार पडा कोई नहीं  था,  पैसा भी नहीं तुमने उन्हें  बुलाया उन्होंने पढकर राख दिया तेरी विवशता देख मैं ने  खा लिया और ठीक भी हो गया  फिर  तुम हंसी,  मैं  भी हंसा , क्यों  न तुम जानी न मैं  जान पाया...

अभिलाषा (मैथिली कविता)

अभिलाषा  वैह   वसात   जँ   फेरो    बहितै सभक    हृदय  के अंदर  घुसितै  छल,  प्रपंच, द्वेष, मैल आ ईर्ष्या  धकैल-धकैल  क' बाहर  करितै            सबक   गला  सब  केओ   मिलितै            श्रेष्ठ के नमन, कनिष्ठ  के  आशिष           दुखियाक दुख सं दुखित,द्रवित हो           हरण    सबक   पीड़ा   के   करितै  शीतल  मंद  मरुत  मे  कुसुमित  वन-उपवन सब  सुरभित  रहितै  खेत-पथार  सब  अन्न सं  भरल फल  सं  लादल  बृक्ष  जँ  रहितै                     नदी,  नाल,  झील  ओ    झरना                      अमिय नीड़ लै कल कल करितै...

ये कैसा गणतंत्र है ( हिन्दी कविता)

ये कैसा गणतंत्र है गण है, तंत्र है यंत्र भी है मंत्र नहीं है राजतंत्र है!  गण तो यंत्र बन गया सोचता नहीं है कम्प्यूटर जैसा प्रोग्राम से चलता है हमरा गण भी ट्युनिंग से चलता है! यहां तो वंश पर वंश पनपता है रोटी का टुकड़ा बांट बांट कर जन को भक्त बनाता है खुद भगवान बनता है! मंत्री है, संत्री है तंत्री है! सभ स्वतंत्र है, गणतंत्र है! जन ही बस परतंत्र है। नव राजतंत्र है! सुना था राजा भला करता था प्रजा का ये राजे तो चूसते हैं,लूटते हैं ठगी का चैम्पियन हैं जनता का ही जानता के नाम से खाते हैं! गण का नर्क है गणपति का स्वर्ग है सभ तंत्र है! गणतंत्र नहीं है भूख है,प्यास है अन्न है,जल है भुखमरी है! खेत है, खलिहान है मकान है, दुकान है कल है, कारखाना है बेरोजगार है! यंत्र है, तंत्र है मंत्र नहीं है गणतंत्र नहीं है! प्रमोद कुमार उर्फ "नेहरू लाल दास" पांडिचेरी दि.26-01-2019

धीपल तव ( मैथिली बीहनि कथा)

बीहनि कथा                                                                           धीपल तव मुन्नी काकिक नजरि सडक पर परलन्हिं। डाकपिन  आवि रहल छल। मुन्नीकाकिक हर्षक सीमा नहिं। अति उत्साहित भ’ बजलिह,”कहै छलहुं! बौवा के लिखियौ! देखलियै आव! अपन खून अपने होइ छै। डाक पिन अबैया’। जरूर मनिआर्डर अनने हैत।“मुन्नी कका कनि आश्वस्त भ’ सोच’ लगलाह।  व्यर्थे संकोच करै छलहुं। आई पढेनाइ लिखेनाई काज देलक। बेकारे  संदेह क’क मोन खराब कैने छलहुं।  मुन्नी बाबू सोच लगलाह। एखने पुत्र सं मोन खट्टा कैने छलाह आ’ आव गर्व होइ छैन!  ।पी. एच. डी. कैने अछि हमर बेटा! बरका यूनिवर्सिटी मे प्रोफेसर अछि। बाप रे! ओकर ठाठ-बाट! नाम-प्रतिष्ठा देख-देख करेजा जुड़ा गेल रहै पौरकां! किताबो लिखने अछि। एम्हर किछु मास सं दुर्दिन चैल रहल छलैन्ह। बड कष्ट! फाटल धोती। एक दिश झंपथि त’ दोसर दिश उघार! पत्निक जोर देला पर बेटा के चिट्ठी ...

चौबटिया ( मैथिली कविता)

चौबटिया  हे चौबटिया  तीन बाट त’ देखल आव चारिम बाट देखाउ ने जन्म लेल,सभ माथ चढ़ेलक अति दुलार,प्यार सभ कैलक ईश्वरक त रूपे बनलहुं कत’ की भेल,किछ नहिं जनलहुं चट शैतानक पदवी पौलहुं  चटकन, मुक्का, भेट' लागल  भरि दिन दौरी, भरि दिन हांफी क्यो निरसै, त' बौंसै क्यो क्यो आव दोसर राह पकरायल हमरा  शरीर मे हृदयक बोध भेल बरका  कखनों लाल कखनो पियर दुनिया हमर मिठगर नोनगर  कपार मे सटल कुदि क हमरा  कपूत, कुपिता आ' कुपतिक पदवी आगां घुमलहुं, पाछां घुमलहुं वाम दहिंन सौंसे भ’ अएलहुं  तेसर राह ओनाहिंयें बितल चौबटिया पर आवि ठाढ़ छी हे चौबटिया अहीं बताऊ चारिम वाट कोम्हर द’ जाउ अहीं शरण मे आबि बैसल छी स्वर्ग, नर्क आ’ पृथ्वी बास सभटा भोगि तजल सभ आस  मुक्तिक मार्ग शेष बंचल अछि हे! चौबटिया वैह बताउ हे! चौबटिया वैह देखाउ!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पॉंडिचेरी, 29-01-2019 pramod_drpk@yahoo.co.in

किससे मांगूं क्षमा आज मैं ( हिन्दी कविता)

किससे मांगूं क्षमा आज मैं किससे मांगूं क्षमा आज मैं जिससे मांगूं वही सुनाता फंसा गुनाहों के दलदल में  जा आगे बढ़ मूरख!  धरा से पूछा,पूछा नभ से वायु, अग्नि और जल से तू ने ही मुझे बनाया  सब मैं ने बर्बाद किया है तू ही मुझे क्षमा दे!  नहीं नहीं नादान आदमी  कहां बना पाये हम वैसा जैसा हमने चाहा तू ही हमें क्षमा कर बन्दे  गलत किया है हमने!  थक हार बैठा था क्यों न अपने से ही अपने किये का क्षमा मांगूं क्षमा करो हे अन्त: मेरे तुम्हें जलाने का दोषी हूं!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पॉंडिचेरी, दि. 29-01-2019 Pramod_drpk@yahoo.co.in

कत्ते बाज' लय (मैथिली लघु कथा)

कत्ते बाज’लै  (बीहनि कथा)  माघक मास! शितलहरी चैल रहल छलै। दिनों क’ लोक सभ दलानक भीतर अंगैठी पजारने रहै छलै। राइतक त' पुछु नहिं। बच्चा आ जुआन -जहान त’ कोनों तरहें निमाहि रहल छल,  बुढ़ पुरान के कष्टक ओर नहि । धीरू बाबू सभ सं पैघ पढ़ाई क’ रहल छलाह। हुनका एकांतक खगता रहैन्हि, तैं ओ दलान के कोना मे संदुक पर सुतैथ, बैसैथ या एना कहु जे दिन भरि ओत्तहि पेटकुनियां देने किछ कहुं लिखैत रहैत छलाह।         गुलाब कक्काक नौकड़ी छुटना बर्षों भ’ गेल रहनि। एगो दोकान मे मुंशी रहथि। एगो पूत, सेहो निकम्मा। फांका चलैन्ह। कै कै सांझ निराधार !सीड़क आ कम्मल के की कहल जाय, एकटा खेनड़ी ओढ़ि जार सं लड़ैथ! सत्तैर-पचहत्तैरक अवस्था, देह मे गुद्दाक निशान नहिं। जार कोना कैटतैन्ह ! धीरू बाबुक सीड़क मे घोंसिया जाथि। कोनो हर्ज नहिं।                   मुदा भुखल पेट निन्न कत्त! राइत भरि अहि करोट सं ओहि करोट बदलैत भोर होइन्ह। नीन नहिं होइन्ह त ‘रहि रहि धीरु बाबू सं समय पुछथिन्ह। आव कत्ते बाजल , आव कत्ते बाजल! अजुको राइत पुछलखिन, “कत्ते ब...

नीक हमर छथि पंडीजी (मैथिली हास्य कविता)

नीक हमर छथि पंडीजी एक जे हमर पंडीजी छथि  ऊंट सन घेंट,घोडा सन टांग  लटकल लटकल कान छनि आ कत्तहु कत्तहु दांत।  आर त’ सभ किछ निके छनि नाके छनि कनि टेढ़।  क्षण क्षण खैनी ठोर मे ठूसथि  नहिं त’ लेता नोइंस जहां सम्हारै छथि ओ चश्मा ढ़ेका जाइछन्हि खुइल।  छौंरा सभ के मजा अबै छै दै छै पट द ‘हैंस  और त सभटा ठीके ठाक पूछु नैं बस हुनक खुराक ! खाइ छथि पूरी सोरे चारि लोहिया भरि तिमन दिय अजबारि गोटैक सेर लड्डू,ओतवे जिलेबी दही चाही दू मटकुरी दक्षिणा यैह किछ सौ-पचास पानक खिल्ली जरदा खास  तहि पर सं पारस ढ़ेर रास गृहणी तकैत हेथिन्ह जे बाट नौतक दिन खासम खास और सभ दिन अजिर्णक वास।  प्रमोद कुमार उर्फ, “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, दी. 01-02-2019

मोटर साइकिल (मैथिली बीहनि कथा)

मोटर साइकिल                                                                          (बीहनि कथा)  ऐं रौ छौंड़ा! भुटवा?? की रौ ?केमहर सुरूज उगलै आई रौ?  केकर मोटर साइकिल उठा अनलिही रौ!  मोकना कें त’ विसवासे नहिं भेलै! काइल्ह तक ई छौंड़ा महींस चरबै छल आ आइ मोटर साइकिल!  हो न हो केकरो वला मांगि अनने हैत। खाई लै लाई ने आ... कथीदन लै मिठाई! मोकना मोने मोन  बुदबुदैल।  केकर ल ‘अनलिही रौ?  हमरे छियै हौ, मोकना भैया।  आएं रौ! कटै छैं घिसियौट आ किनै छैं मोटरसाइकिल! बड नीक। क’’’ केना किनलिही से कनि बता न हमरा।  नैं बुझलहक? महींस बेच देलियै।  की!!!!! महींस बेच देलही। नहिं नहिं ई काज नीक नईं भेलौ।  अच्छा बता,” भैंस बेच क’ मोटरसाइकिल भ’गेलौ”? मोटरसाइकिल! देखहक ने! ई फोनो किन लेलियै!  वाह तों त’ बड़ होशियार निकललैं रौ भुटवा।  हे सुन न! केकरो कहियै नहिं...

स्वागत हे युवराज बसंत (मैथिली कविता)

स्वागत हे युवराज बसंत   बुढ़िया मां छथि कहा पठौने  अबै जाई जाउ हम्मर द्वार के सभ कोन ओरियान मे लागब  क’ ली आई सेहै बिचार  रे कोइली तों बता तोरे देने छलियौ भार  सभ के तों त’ कहि ऐलही ने लागल नहिं हेतहु आव जाड़।  हे कोइली तों गीते गबिहैं मैना, बगड़ा, बुलबुल, परवा तों सभ मिल क’ झाइल बजबिहैं रे हंसा तों बीणा तनिहैं हे लुक्खिया तों थपरी पिटिहैं।  गाछ-बृक्ष के हवा के भारा आवि रहल अछि हमर दुलारा  दस मासक यात्रा बड़ भारी स्वागत करू सब नर-नारी।  अमलतास तों माला बनिहें कचनार बनि जायत धोती गुलमोहर के पागक भारा रे गुलाब तों सौरभ बटिहैं  आम आ’ महुआ चंवर डोलाओत  युवक-युवती सभ नाच देखाओत  भंवरा के त' जागल भाग मौधमाछी सभ मौध बनाओत।  आई भोर मे हमरा भेल भास  क्यो ठकठकेलक हमर द्वार सूर्य किरण के रथ पर चढ़ि क' आवि ठाढ़ रहथि,बसंत कुमार।  शिशिर के भ गेलैन्ह तैयारी जाइये रहल हुनक सवारी।  तखने कुंवर सिंहासन बैसता भेटतन्हिं ऋतु राजक पदवी।  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 04-02-2019.pramod_drpk@yahoo.co.in

हेरायल जीवन (मैथिली कविता)

हेरायल जीवन पायलक रुण -झुन कनबालिक चमक  कोयलिक पंचम वीणाक तार पाइनक कल कल  हवाक गुदगुदी कियै दुखाइयै तिमनक स्वाद माछक झोर आ' फुलबारिक फूल सं कियै मुंह दुसाइयै रुपैयाक ढ़ेर आ थुलथुल देह हवा मे विचरण कियै छुछुआवैया पहिल बेर आई हृदय सं कान मे ईयर फोन जोड़ा गेल  सभटा कियै भिन्न भिन्न  आव सुनाइयै दिमागक सोचलाहा  बेकार बुझाइयै दिलक जे सुनने रहितहुं  गामें मे रहितहुं शहरी जीवन मशीन भ’ गेल से आब बुझाइयै।  वेशी की लिखू किछ ने सोचाइयै माथ झनझनाइया' मेलाक बिच छी हेरायल सन बुझाइयै।  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरु लाल दास “ पांडिचेरी 08-02-2019

सरस्वती स्तुति (मैथिली)

धवल वसन हंस वाहन तंत्र वीणा का कस दे                     शारदे वर दे बसंत पवन, मृदुल अनंत ज्ञान  की  वर्षा  करदे                    शारदे वर दे अक्षर साधक,यह मूढ़ मानव वरद   हस्त  तूं   धर दे                     शारदे वर दे नित पूजूं मैं तुझको हे मां ऐसा  ही  मन  करदे                       शारदे वर दे ! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी

यह सुगंध कहां से आता है (हिन्दी कविता)

यह सुगंध कहाँ से आता है पग पग पर हैं कीच पड़े ओछे-खोटे लोग भड़े सूखें पेड़ हर मौसम में हरियाली कौन खिलाता है                    यह सुगंध कहां ......। भावहीन इस उपवन में  पाषाण हृदय ही चलता है अन्धकार भरे जीवन पथ पर दीप लिये कौन चलता है।                     यह सुगंध कहां.....। चीख-पुकार, शोषण-रुदन हर पल मूल्यों का चीर हरण कोलाहल भरे इस जीवन में किलकारी कौन गुँजाता है                      यह सुगंध कहां.....। ऋतुओं का कोई भेद नहीं देश काल का लेख नहीं धू-धू कर जलते मानवता पर शीतल जल कौन बरसाता है                        यह सुगंध कहाँ ......। @ प्रमोद. 10-2-2018

मैं क्या हूं (हिन्दी कविता)

मैं क्या हूं मंत्र हूं कि  तंत्र हूं किसके साधना का यंत्र हूं मैं! शब्द हूं या अर्थ हूं या यों हि फिर  ब्यर्थ हूं!  जल हूं प्रवाह नहीं  हवा हूं  गति नहीं  धरा हूं  धैर्य नहीं  सूर्य हूं  तपिश नहीं  चाँद हूं शीतलता नहीं  संदेश हूं या वाहक हूं!  आता हूं जाता हूं  हे विधाता!  अव बस कर थका हुआ सा पाता हूं।  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 11-02-2019

उड़ान (हिन्दी कविता)

उड़ान खोढ़र से निकलने का आतुर क्षण  परों को तौलने का व्याकुल मन!  परखा तो हवा भरी थी परों में  उन्होंने पूरी कोशिश की थी  खूब ऊर्जा भरी थी भर दिया आज उड़ान मैंने  मन में उमंग है तन में तरंग है  वृक्षराज के फुनगी को छुउंगा मैं  पर्वत राज के मस्तक को चूमूंगा मैं    होड़ लूंगा हवा से  बादलों के पार जाऊंगा सोचता नहीं हूं  भूख की, प्यास की गगन में उन्मुक्त विचरण का आनंद मनाऊंगा, गुनगुनाऊंगा मैं  उड़ा हूं उड़ता ही जा रहा हूं  क्षितिज को छुउंगा गति बढ़ा रहा हूं वह लाल बड़ा गोला ! क्यों भाग रहा है ! जल्दी जल्दी  हमसे तेज  फिर भी उड़ रहा हूं  कहां है क्षितिज की सीमा!  उसने पंख तो दिए मगर क्षितिज को अंतहीन  बना दिया!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी ©सर्वाधिकार सुरक्षित

आशा ( मैथिली लघु कथा)

आशा                                   (लघु कथा)  खट... खट....! खट....!  खट..........! खट.....!  हे भगवान! आव ई के आएल! अहि भोरहरवा मे!  हो न हो, फेर वैह हैत! आर के भ’ सकैये। दिन भरि त' परेशान कैनहें रहैयै, राइतो क’ या भोरहरवो मे कनि बकैस देत से नहिं।  खट…!खट... खट....!  ओह! मोन करैयै जे अपने स’ माथ नोईंच ली! ठहरह तों! तोरो अहि वेर मजा चखबै छियौ।  खटखटवैत रह’! तों थेथ्थर त’ हमहूं थेथ्थरे भला!  खट खटाब’! जत्ते मोन होइ छ’ तत्ते!  फेरो वैह!!!! खट... खट.... खट...!  दुनु हाथे माथ पकैर क’ बैस गेल बिलटा! बाप रे! ई “बिपत्तिया “हमरे पाछां कियै पड़ल अछि!  सभटा त’ दैत जकां हुड़लक। खेत, पथार, माल-जाल, रूपैया -पैसा!  एगो बेटो छलै सेहो....  देह मे कनि गुद्दा बँचल अछि, लगैया’, पहिले गुद्दा नोचत आ तेखन खूनों चुसिये लेत ! खट...! खट...! खट....! खट....! जेखन बरी काल धरि केबार खटखटाइते रहलै , त’ बिलटा के आभास भेलै जेना, “ई आवाज त’ अनठिया जकां बुझाइछै। के ...

श्रृद्धांजलि (मैथिली कविता)

श्रद्धांजलि  बहुत  भेल आव हे  शांति दूत  आव घर मे घुसि क’ मारू भूत  कोनो ने आव कसर  रहि जाय दुश्मन के त’ दिय नाम मेटाय।                 कथी लै एटम वा   हाइड्रोजन ः                कथी लै पृथ्वी ,कथी लै अग्नि                दाइग दिय गोला,फोइर दिय बम                 दुश्मन के क’ दिय नाको दम ।  नहिं रहै  कोनो  नाम ओकर करू सभटा ओरियान तकर चौवालिस बलिदानक बदला ल दुश्मन के नहिं रहै नाम बंचल                 श्रद्धांजलि, श्रद्धांजलि हे अमर पूत                 हे वीर अहां के भावांजलि अश्रुपूर्ण                 नहिं जैत व्यर्थ अहांक प्राण कहैछी                 प्रण लैछ आई भारत महान कहैछी! प्रमोद कुमा...

चिनगी उड़तै (मैथिली कविता)

चिनगी उड़तै चिनगी उड़तै  जिनगी बनतै  बढ़ैत चलू हे! पथिक  जनै छी पथ बड़ कठिन अछि कांट बिछैल अछि कीच सं पाटल अछि रोड़ा पाथर पड़ल अछि वसन ताड़ ताड़ भेल  घामक धार भेल औंठा फुईट शोनितक धार भेल गन्तव्य अपार भेल निराश छी! हतास छी अहां! चलू, चलैत रहू  पाथर सं पाथर भिरतै  चिनगी उड़तै रस्ता खुलतै कीच बनत दीप अहांक, हिम्मत बनत बाती प्रकाश पसरतै  चिनगी उड़तै  जिनगी बनतै डेगे डेग बढ़ैत रहू चलैत रहू हे साथी!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 16-02-2019

नाथ, अनाथ (मैथिली कविता)

नाथ, अनाथ ! हम दिनकर, दिवाकर, भास्कर हम दीनानाथ, अनाथ! दौड़ते रहै छी भाइगते रहै छी,तैं  हम गोल छी, लाल छी छी धधकैत लहकैत ज्वाला  भोरे जगबै छियै  बात कथा सुनै छी।  नहिं बरसलै बादल नाम लागल हमर सभटा जरा देलकै!  कनियां काकी पारलन्हि अदौरी बदरी लाइद देलकै  बदनाम भेलहुं हम  रौदे नै उगलै ! जारक मास कुहेश लदलकै  जारे सभ ठिठुरै बदनामी हमरे कपार दिनकरो बुढ़ा गेलै कत्ते गरम छलै आव ठंढ़ा गेलै! ऋतु बदललै  गृष्म पसैर गेलै घाम चूलै भोरे भोर लोक सभ चिचियैल  केहन निर्दयी छै ई सुरुजो  भोरे जड़ब’ लगै छै।  जेठक दुपहरिया  मुर्छित भ’ खसलै बटोही हे! दिनकर कियै मारै छहक! खापरि फुटल हमरे कपार!  सभ सं दुलारी धिया हमर  नाम देलियै पृथ्वी ! नाइत,नातिन त’ कोइसते छल आव ईहो कहैया’  जहिया सं जनम भेल  नचेनहें छी  आव की करू!  नाथ हम!  अनाथ छी!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरु लाल दास “ पांडिचेरी, 16-02-2019

बलिदान (हिन्दी कविता)

बलिदान  याद है आपको  हजारों वर्षों का इतिहास  नहीं न!  कैसे याद रहेगा  हम बहुत भुलक्कड़ जो हैं!  चार दिन के बाद ही भूल जाते हैं बलिदान का उद्घोष होता रहा  हम जान लुटाते रहे लुटेरे आते रहे  गद्दी पाते रहे  देशी और विदेशी  किसी ने लूटा  किसी ने तोड़ा, फोड़ा  अस्मिता भी लूटा ,प्रतीक मिटाया  हम बलिदान देते रहे लेकिन पन्ने में नहीं आये गद्दारों ने पन्ने भर लिये!  हर युग में, हर समय में  जयचंद आता रहा है  आता रहेगा  वेचारा प्रताप, शिवाजी,  पृथ्वी, वोस,लक्ष्मी,भगत, आजाद,राजगुरु कितना गिनाऊं बलि होते रहेंगे!  मातृभूमि के नाम पर ! अव तो लगता है  हमारे धमनियों में  पानी बह रहा है!  उठो हे वीरो!  अर्जुन बनो, गांडीव धरो दुश्मन को रौंदो और गद्दारों की चटनी पीसो।  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 18-02-2019

युद्ध आ परिणाम (मैथिली कविता)

युद्ध आ परिणाम  भांजू तलवार युद्ध भूमि जा आकि शांतिक  माला  जापू नहिं फुरा रहल  अछि  आई आगू बढ़ि कनि दिय’ बताय।            युद्ध  त  हम  अनेकों   लड़लहुं           रावण    मारलहुं,   राक्षस   ढ़ेर           कड़ोरों मारि कौरव के जितलहुं            शांति  त’  नहिं  सपनों   मे भेल बिलखैत वालक, कलपैत माय अनेकों  मांगक सिन्दुर   पोछैत बृद्धक  आस  आ गामक गौरव  सबतरि   एहने   कुदृश्य  देखैत             केहन द्वन्दव मे फंसलहुं आइ            युद्ध  करैत  ने शांतिये  भेटल            शांति शांति क’ युद्धे  टपकल            अहि  बिपत्ति  के कोन उपाय।  कोन   दुश्मन...

हमर भाषा बड़ पैघ आशा (मैथिली कविता)

हमर भाषा बड़ पैघ आशा  आई(21-02-19) मतृभाषा दिवशक अवशर पर मां मैथिली के समर्पित हमर ई रचना मिश्री सन अछि भाषा हमर  रसगुल्ला   पेनतोवा   बोली जीवन  पथ  पर आगू  बढ़ब  जं शिक्षा माध्यम हो मैथिली                       मायक भाषा, बिनु  प्रयत्ने            सिखलहुं जिवनक आचार           बिनु  अक्षर  के  ज्ञाने हमत'          भ’   गेलहुं,  ज्ञानी, आचार्य  ममता मयी  माय  हमर छथि  स्नेहमयी  छथि   हमर  भाषा लोक  सभक त’बाते नहिं पुछु क्यो    भेटता   नहिं    दुर्वाशा            आऊ,  चलू   आगू     बढ़ू           मैथिलिक  करी नित सेवा           करैत  रहव,  करिते  रहव  ...

चालिस का बदला (हिन्दी कविता)

चालिस का बदला जहाज जब उड़ा दुश्मन के सीने पर छप्पन ईंच का गरजना सुना तुमने! रौंदा,ध्वस्त किया बंचे दुश्मनों का पैंट गीला हुआ यह तो नमूना था भागता है तूं कायर! हवा में मारेंगे समुद्र में डुवा डुवा कर मारेंगे! बकस रखा था भाई समझ रखा था सह लिया गुस्ताखियां अव देख कायर! पहाड़ का डोलना तुम गीदड़ों का,चिल्लाना, भागना अभी तो बोहनी किया है तुम्हारी गल्तियों को एक एक कर तौलुंगा कसम भवानी की एक को भी नहीं छोड़ुंगा।

मुदित मन (मैथिली कविता)

मुदित मन आई हम देखल प्रकृति कें खेती मे लागल प्रत्यक्ष कतहु बहा क' झील ओ झरना कतहु बहा क' नाल, नदी कतहु उगावै पहाड़ पहाड़ी त'  उगेने छथि कतहुं चिड़क वन ओ घासक जंगल कतहु लहलहैत खेत कोनो करिक्का त कोनो उजरा बादल नुकाइत,छिपाइत,नटखट ओ चंचल चुमै कखनो शीष तरुवर के,पर्वत के चट द' धरतिक चरण पखारै स्वक्ष पवन, उमंग अनंत चरण धराक चुमि, बादल के ठेलै त' खेलैत कखनो तरुवर के संग कतहु हरिण ताकै स्तंभित चिड़ै- चुनमुन्नी गोसाउनिक गीत गाबथि कण- कण निर्मल जन- मन कोमल प्रकृतक कोर में बैसल हम आई तिरोहित अछि मन संतति के संग। प्रमोद कुमार उर्फ "नेहरू लाल दास" उमियम, शिलांग,( मेघालय)

ब्याह' चलला शिव हमर (मैथिली कविता)

ब्याह' चलला शिव हमर ( शिव रात्रि के अवसर पर विशेष) जटा-जूट   बिच चंद्रमा शोभय झर झर बहैत छनि गंगक धारा गर  में सुशोभित सांपक माला कंठ   हलाहल  लेलनि  समाय           सौंसे  भाल  त्रिपुंड  शोभै छनि           बिच  मे  छनि  तेसर  नेत्र समैल           कर कमंडल डमरू डम डम छै           प्रचंड   त्रिशूल  दियै उर कंपाय भांग   धधूर   चढ़ौने  शिवजी बैसल बसहा पर छथि मुस्काइ नाचै   पाछां   भूत   प्रेत   सभ रंड  मुंड   बाघ   छाल  उड़ाय           विकट रुप लखि लखि सखि सभ           लंक   लगा   क'    गेली     पराय           मैना    रानी    मुर्छित  भ' खसली         ...

बिगड़ल जमाना (मैथिली बीहनि कथा)

बिगड़ल जमाना                           (बिहनि कथाक दिवस पर विशेष)  भोल्वो बस। मद्रास सं पांडिचेरी अबैत रहै। सीट बिच मे भेटल रहै। ए सी बड्ड तेज। जाड़ लागै तैं दुबैक क’ बैसल रही। हमरा आगां किछु नवयुवक -नवयुवती सभ जोड़ लगौने बैसल छल। बात चितक क्रम मे बुझना  गेल जे ओ सभ बिहारे सं अछि। हिन्दी अंग्रेजी फेंट फेंट क’ बाजै। पछुलका सीट पर एगो समभ्रांत सन तमिल दम्पत्ति बैसल छलाह।  तमिल महिला बजलिह, “देखियौ केहन निर्लज्ज सभ छै। एना त’ वरो-कनियां नहिं करैत हेतै।“ने कपड़ाक ठेकान आ ने.... “ हमर ध्यान अनायास ओमहर गेल त’ देखलहुं जे एगो जोड़ी गप्पो करैया’ आ चुम्मा.... “ एतबहि मे ओकर फोन घनघनेलै, “हां पापा! हम ठिक छी। अहां सभ कोना छी। “ हां हां! रिज़ल्ट...! खुब निक रहल! अहां चिंता नहिं करू!  आएं! की कहलियै! ई पों पी के आवाज?  हां सेमनार चलि रहल छै,ओही मे ई आवाज आवि रहल अछि।  हं पापा! सेमिनार  रोड साइड मे चलि रहल छै।  तैं ई पों पी सुनाइया’ अहां के।  हं हं ! सेमिनार खतम होइते हम अहां के फोन करब...

बूंद बूंद में उलझी जिन्दगी (हिन्दी कविता)

बूंद बूंद मे उलझी जिन्दगी  बूंद हूं बूंदें हूं लकीर हूं धार हूं, बहता हूं नदी हूं,  समुद्र तक जाऊंगा  जाता हूं, फिर वाष्प हूं उड़ता हूं, बादल बन बिचरता हूं फिर बूंद हूं गिरता हूं गिरने उड़ने में फंसा हूं डोर से बंधा हूं कठपुतली हूं  नचाता है नाचता हूं।  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 05-03-2019

हमर गाम आ हम (मैथिली कविता)

हमर गाम आ हम (अपन जन्म दिवशक अवसर पर माय’ मैथिली आ' मिथिला कें हमर सादर भेंट)  गाम आयल छी मुदा भुतलायल छी डिह डाबरक अवशेष!   चारू दिश सं प्रश्नक बौछार  उत्तर की देवै परेलहुं पिपरक गाछ तर  तरुवर त’ वैह छथि फैलाव बढ़ल, हाथ पैर किछु सुखैल,सिडैल,आंइखो जेना पथरायल!  बहुत देर लगलैन्ह चिन्है मे आव’! बैसह! छाया आव हम की देबह!  हां, सकून भेटतह!  तकैत छी चारू दिश  बुढ़वा महादेव के रस्ता  खरंजा बैस गेलैया' सड़क सभ पिच भ’ गेलैया' रुप -रंग त’  ओहिना  लोक सभक चेहरा बदैल गेलैया’ घोर निराशा!   दू पहर बित गेल लोक सभ आयल, चलि गेल ओही मे सं क्यो पागलक संज्ञा देलक आव हमर वैह नाम भ’ गेल  छौंरा सभ चारु कात सं घेरने अछि क्यो कनि चाउर भुजल त’ केओ कनि मुरही,एक टुकरी सोहारी  आगु मे फेकलक  एकटा बच्चा पुछलक  पाइन पीव!’  आ एक गिलास पाइन द’ गेल! बुढ़वा पिपर कनि खुश भेल एकटा बालक, मुंह मे धूरा लेपटल लोर टघरै के निशान गाल पर  लागल जेना पैसा मंगला पर माय’ मारने होइ चट दनि दूटा चौकलेट  जे दुनु मुट्ठी मे कैस क’ पकरने ...

ममता मयी (हिन्दी कविता)

ममता मयी   (अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष)  पौध भी है कलियां भी कुसुम वही, बगिया वही अद्भुत फूलों से सजी डलिया वही सुगंध फैलाती, सकून लाती प्रेम-प्यार के गीत गाती झुन-झुन के स्वर लहराती  आंगन की शोभा वही ममता वही, दया वही अनवरत बहती प्राणमयी नदिया वही स्पंदन की कोमलता  आंचल की छाया सुधा की धारा  लोरी सुनाती,  नींद गंवाती  उर में धरकती जीवन की मिठास वही गाऊं कितनी गाथा कोई अंत नहीं  हे धरा! हे माता!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 08-03-2019

भूत (मैथिली लघु कथा)

भूत                                                         (लघु कथा ) दह दह इजोरिया। भादवक राति। यैह करिब डेढ़ -दू बाजल रहल हेतै।आकाश मे कतहु कतहु करिया बादलक धब्बा! वैह कखनों क’ किछ बूंद टपका दै। नौ बजिया गाड़ी आदतानुसार लेट। हम ईंटर मे पढ़ैत रही। एन. सी. सिक परेडक कारणें अढ़ाई बजे वाली गाड़ी छुइट जाइत छल। सप्ताह मे दू दिन बुद्ध् आ’ शुक्र दिन। मधबन्नी सं राजनगर एके गो बस चलै, बोल बम!  जेहने नाम, तेहने चरित्र। कखैन, कत्त भंगठि जैत से नहिं जानि।  कंडक्टर! हे भगवान! एखनों रौइयां ठाढ़ भ’ जाइत अछि। चांडालक दोसरे रुप! किछ भ’ जाय, चमड़ा छिल लेत। भाड़ा लेने छोड़त! दमड़ियो कम नहिं करत।  अभावक समय रहै। गाड़िक पास बनौने रही तैं ओही सं आवी। चारु दिश एकदम सन्नाटा! जेना सभ के सांप सुंघि लेने होइ।  झिंगुर पंचम सुर मे गबैत। टिशन सं मछहट्टा तक मात्र दू-चारि टा दोकान आ किछु घर सभ। यत्र तत्र। दूरी यैह करिब दू-तीन सै मिटर। परन्तु मछहट्टा सं दारु भ...

पागल (मैथिली कविता)

पागल  दू डेग आगू ,एक डेग पाछू  नाइच लै यै ,चारु कात ओ गुन धुन गुन धुन ,की जपैया’ लटपट लटपट कियै चलैया' धोती चिथरी, फाटल बेमाय अस्थिपंजर, सटकल पेट  मांगै ने भोजन आ ने पाइन ने कोनो परिचय आने पात  ने कोनो घाट आने बाट  जे किछु दै छै, खा लै छै  कुकुर बिलाई,संग बैसा लै छै ने चोरी आने डकैती  ने कोनो छिना जोरी  नहिं ब्यभिचार,नहिं अत्याचार  नहिं कोनो बर्तन आने वासन  छै ने ओढ़न आ ने पहिरन  नहिं कोनो कुटिया आ ने आश्रम  नहिं बोखार आने खांसी नहिं बुझै जार आने गर्मी ई मूढ़ मानुष समझि ने पाबै  कियै ओकरा लोक कहै छै पागल  जे दिन राइत लूट,खसोट,ब्यभिचार मे लागल  ओकरा पदवी, नौकर चाकर  ने ओ लक्षमण राम के ने मीरा घनश्याम के अपने अन्त:मे खोजि रहल  अपनहिं सुख धाम के!  क्यो ज्ञानी आइ हमरा बुझाबै दर्शन मे लागल ,पागल कहाबै! घोर पापियो सभ पाग चढ़ावै।  प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 13-03-2019

मैं और मेरी सांसें (हिन्दी कविता)

मैं और मेरी सांसें क्यों धमकाती हैं  हर सुबह, हर शाम  हर घड़ी , मुझे  मेरी ही सांसें!  जहां कहीं कुछ हांका नहीं  इधर उधर कुछ झांका नहीं  बस चढ़ आती हैं सांसें जोर जोर से चलने लगती हैं  धड़कने बढ़ा देती हैं  छोर कर चल दूंगी तुम्हें  धमका देती हैं सांसें!  उस दिन  एक बकड़ी का बच्चा  कार के नीचे आ गया  में में चिल्लाया  सड़क किनारे खड़ा मैं  बस यूं ही देखता रहा सांसों को मौका मिला  बड़ी जोर का धमका गया  अगले ही दिन  चौराहे पर खड़ा था चाय की चुस्की ले रहा था एक लफंगा  एक युवती का दुपट्टा उड़ा गया मैं अवाक, पर कुछ कर न सका इस वार मेरी सांसों ने ऐसे जोर से धमकाया  धड़कन बेहिसाब  पेशानी पर पसीना छाया धड़कन बंद  सांसें गुल  बहुत से लोगों की पैरवी पर  फिर वापस आया  अब बाहर नहीं निकलता हूं सांसें गंवाने का रिस्क नहीं लेता हूँ।  प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 14-03-2019

फेर अएलै होली (मैथिली कविता)

फेर अएलै होली  फेर  सं  होली  आवि  गेलै   पियरगर  गोपी सभक मोन छै उमंग स हरियर  टोला  ओ  पड़ोसा मे भीर  भेलै भारी  गोपी सभ लागथि बड़ सुन्नर पियारी !                   गोपी सभक  तैयारी  छैन बड़ भारी                    रंग अवीर गुलाल छथि  सब  रखने                    थाल मे गोंतथिन,छथिन्ह ओ सोचने                   अहि   बेर  राधा  बनि जेती  बेचारी ! कान्हा त अपने बड़ चतुर सियान छथि  राधाक पलंग  तर जाक’ नुकायल छथि राधाक  घर  भरल  छनि रंग  कचनारी  राधा  त  आई   बड़   तृप्त   छैथ  नारी!                       खीर  पुरी  पुआ  और  छै तरकारी  ...

हमर सुंदर कनिञां ( मैथिली गीत)

द्वार पर ठाढ़़ होलिक सुभागमनक अवसर पर अपन प्राण- प्रिया के हमर भेंट( गीत)               हमर सुन्दर कनिञां हे यै कनिञां हमर सुन्नर अहांक साड़ी गोर अहां रत रत केश बड़ कारी                हे यै कनिञां.....! आंखि अछि पैघ पैघ ठोर लेने लाली ग्रिवा अछि घिचल घिचल नाक अछि आरी                हे यै कनिञां....! रुन-झुन पायल अहांक चमकै कन वाली तन भिजत मन भिजत भिजत अंगिया कारी                हे मैं कनिञां.....! हंस सन चालि अहांके एखनो युवती नारी रंग बोरव अवीर लेपव तोरब हम खुमारी                हे यै कनिञां......! प्रमोद कुमार उर्फ "नेहरू लाल दास" पांडिचेरी,17-03-2019

नुकायल होली (मैथिली बीहनि कथा)

नुकायल होली                                               (बीहनि कथा)  हे यै.! यै..! फुस-फुसा क' नन्द रानी रतन कुम्मरि के जगबै छथिन्ह। अकचका क’ रतनकुम्मरि पुछलखिन।  “की भेलैन दीदी! भोरे भोर कियै तंग करै छथि। “ “चुप चुप! “ठोढ़ पर अंगुरी राखि नंद रानी कहलखिन्ह, “यै रतनकुम्मरि चलु ने हमहुं सभ होली खेलैब। “ देखियौ त’! हे भगवान! ई पगला गेलखिन दीदी।  विधवा सब कत्तहु रंग अबीर खेलाई!  एखने सभ गाम सं निकाल -बाहर करत,”रतनकुम्मरि बजलिह! “ बद्री कका के जनिते छथिन्ह," जिबते चिता चढ़ा देथिन्ह"! लोक सभ बुझतै तब ने! हम सभ खुब मोन सं होली खेलैब आ’ भोर होइ सं पहिने पोखरि मे नहा सोना क’ चलि  आएब। एखन हमर सभक उमेरे की भेलै! पैंतिस -चालिस कोनो उमेर होइछै।  सधवा सभ त’ देखियौ एहि उमेर मे उधियैल फिरै या! हम सभ विधवा भेलहुं त दुइर गेलहुं।  दुनू एक दोसर के खूब रंग -अबीर लगौलैथ आ लोक सभ के जागै सं पहिने, पोखरि जा, रगैर-रगैर क’ नहा धो  क’ घर आबि जाय गेलिह। ...

अक्षर (हिन्दी कविता)

अक्षर हे अक्षर! हे अणु! तुम ब्रह्म हो, रचते हो तो ब्रह्मास्त्र क्यों हो तुम सूत्र  हो , बनाते हो जोड़ते हो,तोड़ते क्यों हो बन्धन में बांधते हो तुम्हीं तो मंत्र हो जोड़ने का मंत्र दो  तुम्हें जोडूं ,राग बनाऊं जड़ चेतन को झुमाऊं गीत लिखूं ,पंक्ति रचूं वालक बृद्ध सबके भाल चमकाऊं सब को दुलराऊं गर्मी, जाड़ा, वर्षा,बसंत शिशिर हेमंत, ऋतुओं के सुर बन जाऊं दुलराऊं, हिलराऊं युबक-युबती के हृदय में पैठ धरकूं , ईठलाऊं ,ईतराऊं कभी कोमल, कभी निर्मल  कभी चंचल बन  आंखों में पैठ शरमाऊं  सबके जिह्वा पर बैठ होंठों को सहलाऊँ ,मुसकाऊँ  मां की ममता, पिता का प्यार  भाई-बहन का पुचकार  दादा-दादी, नाना-नानी के किस्सा, कहानी में बैठाकर तुम्हें लोरी बनबाऊं अतः हे अक्षर!  हे रचयिता, तुम तो  अजस्र हो, अजर हो, अमर हो रचना का मंत्र ही रहना  विनाश का सूत्र बनकर  संहार न करना!  प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी 11.02.2019

चिड़ईक चिंता ( मैथिली कविता)

चिडईक चिंता  एक छै चिड़ि, एक चिड़ै  एक छै खोंता, दुटा बच्चा चीं चीं चूं, वाप रे वाप!  नहिं बाज तुं!  कियै गे माय’! पुछै ऊ!  हे यौ बाबू! हे गै दैया ई  दुनियां छै बड़का झूठ!  जे देखै छी,ओ नहिं ओहन  सभ के उल्टा पुल्टा रुप!  देख देख तु,! ऊ’छियै कौवा, कांऊ काऊं काऊं जे किछु लैव ,झपैट ल’ जैत  नहिं त’ चिल्होरि के जा सुनैत  ऊ’ देखु बाबू ,वैह छी चील ! कांकोर सन चांगुर ,चुट्टा सन चोंच  झट उड़ा जैत , खा’ लेत सौंस!  ‘ऊ’ के माय' ऊ छी लोक  ज्ञानी छी, ध्यानी छी छी दयाक प्रतिक,कहै छै हे नेना सभ ,सुनि लिय’ चुप्पे चाप बड़ धोखेबाज ई कखनो दुलार, कखनो प्यार  दोसरे क्षण मारि क’ खाजैत करत ढ़कार  तैं यौ बाबू! हे गए बुच्ची  हमर दुलारु, चुन मुन चुन  पंछी बनी’ ,सब चाहैत अछि  चिड़ई के दु:ख  के जनैत अछि! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पॉंडिचेरी, 25-03-2019

टुकड़े टुकड़े आंसू ( हिन्दी कविता)

टुकड़े टुकड़े आंसू  एक टक पलकों के किनारे  फरफराते होंठों को निहारते  टपकने को बेचैन आंसू उनके अन्दर चमकता क्या है!  तोड़ कर देखा मैंने अरमानों की चिताएं थीं टूटे हुए जिगर के टुकड़े थे  आह भरी सिसकियां थीं धधकती ज्वाला भी थी!  सोचने को मजबूर किया  कितने उमंग भाप बने होंगे  कितने सपने चूड़ हुए होंगे  कितना घुटन ढोता है यह बूंद ! कितनी व्यथाओं के सबूत हैं ये आंसू!  अपने को रोक  थरथराते ओठों को मुस्काने को  मजबूर किया है इसने  हिम्मत कर , पूछ लिया आंसू से कैसे ढोते हो इतनी ज्वाला  व्यथा, घुटन और लाचारी  क्या कहूं ,जिसके उर बसता हूं इतना शीतल निर्मल है ,कि मैं भी शीतल ही रहता हूं  बाहर आकर भी अकसर  पानी का एक बूंद ही रहता हूं शायद ही कभी  ज्वलनशील बन पाता हूँ! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी, 28-03-2019

काकी गीत ( मैथिली गीत)

काकी गीत  (मित्र लोकनि, हम एकटा गीत लिखवाक प्रयास कैलहुं अछि। अहि गीत मे ओहि तरहक ब्यक्तिक मनोभाव परिलक्षित कैल गेलै, जे वर्षों पहिने जीवन यापनक क्रम मे गाम छोरि परदेशी भ’ गेलाह। बाल -बच्चा सभ पढ़ि -लिखि, विवाह दान कय आन आन ठाम जिवन जी रहल छथि। आव ई दुनु गोटे बूढ़ आ असमर्थ भ’ गेल छथि। प्रतीकक रुप मे कौआ के अपन मोनक उद्गार सुनवैत अत्यंत बृद्ध अपन काकी के संदेश पठवै छथिन)  काकी भेजलहुं हैं कौआ के गाम यै                                कनि बथुआ पठा देब  पठादेव काकी सेरसो के साग यै                                 कनि पटुआ पठा देब । तिलकोरक पात भेजु, भेजू एरकंचन -2             भेज दिय’ मुंगरी माछ यै                                कनि घौका पठा देब।  कत्तेक भार आयल कनिञां के गाम सं -2 भेज दिय’ पान ओ मखान यै -2...

हे रौ मनमा गाम चल ( मैथिली गीत)

हे रौ मनमा गाम चल                             (मैथिली गीत)  हे रौ मनमा गाम चल ,गाम  चल  गाम चल  मरुवा रोटी खाक’ तू पाइन पीबिहें कल पर                     हे रौ मनमा गाम चल  गाम चल  गाम चल।   नहिं निक लागै पांच सितारा, कोठा सोफा,मोटर कार एसी कूलर छोड़ि छाड़ि क’ खोपरी  बन्हिंयैं  गाछ तर                      हे रौ मनमा गाम चल गाम चल गाम चल । कचरी मुरही झिल्ली कच' अल्हुआ  सुथनी और केसौर  हाट बजार जा अनवै मनमा, कचैर कचैर खैब गाछ तर                        हे रौ मनमा गाम चल  गाम चल गाम चल।  शहर मे सभ त चुप्पे चाप ,नहिं निकलत नहिं  करतौ बात  दिन भरि हम त' वक वक करब ,राइत क सूतब चुप्पे चाप                     हे रौ मनमा गा...

पगली के बच्चा (मैथिली कविता)

पगली के बच्चा  आइयो त' ओहिना खेनरी ओढ़ि बैसल छलै  टिशन के कोना मे मोने मोन किछ बुदबुदाइत  पगली छै!  तखने ओकरा अभरलै  एकटा बालक  ओकरे सं सैट क' फोकरि फोकरि कनै छै बगले मे अईंठ ठोंगाक ढ़ेर  दू दाना मुँह मे देलकै  बच्चा और फोकरै छै  पागल छै,की जनतै  ई कत्त सं अएलै  मुदा ओकर आंखि भिजलै  पिपनी पर सं दू बूंद टपकलै  उठेलकै  छाती सं सटेलकै  आव जत्त जाई छै  सटौनहें रहै छै जीवै छै ऊ बच्चा  पता नहिं  की पीवै छै।  ऊ पगली  डबल पगली कहाइ छै!!  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी, 06-04-2019.

के बनौलक हमर चश्मा (मैथिली कविता)

के बनौलक हमर चश्मा  ताकि रहल छी  भोरे सं हम  के बनौलक हमर चश्मा  अह्लादित छी उत्साहित छी  बड़ दीव अछि  बड़ बिचित्र अछि  जेना एक्सरे मशीन!  सभ सं पहिने  अपने दिश घूमल  घृणा, छल, कपट सं भरल अन्त: कर्ण जेना नोचि फेकलथि कवच कुंडल कें हमहुं फेक क’  अएलहुं बाहर  दुनियां त’ बदलल बदलल!  बौआ बौआ जे सभ रटै  लोभी एक नम्बर के निकलल  बाबू बाबू कहै वला सभ  बरका ठकहा जीव ! सर सर कहि कहि हुकुम बजावै  चमकैत छूरा, खोंसने ढ़ीठ!  जिज्ञासा बस सभ के जंचलहुं  भाय’ बहिन तक के नहिं छोरलहुं  कतहु जल, निर्मल नहिं भेटल  हारि क’ चश्मा माय’ दिश घुमल  चट छाती सं हम जा लगलहुं! यैह छी स्वर्ग! यैह छी स्वर्ग!  केहन चश्मा अहां दीव बनौलहुं!  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी, 11-04-2019

ऐ हवा हमें बता दे (हिन्दी गीत)

ऐ हवा हमें बता दे ऐ हवा हमें बता दे  कहां ले चली उड़ा के धरती पे मैं  खड़ा था  गिरने का डर भुला के                ऐ हवा हमें बता दे ………..! मैं  विचर रहा गगन में  अद्भुत समा बंधी है बादल हैं साथ मेरे  नभचर गले लगायें              ऐ हवा हमें बता दे........... ! सितारों की लम्बी बस्ती  हैं चांद की अदाएँ  क्षितिज भी जैसे मुझसे  मिलने को दौड़े आए                ऐ हवा हमें बता दे………..! ऊँचाइयों पे आकर  मुझे डर सा लग रहा है  गिर गया  मैं कभी तो  मुझे कौन फिर उठाये              ऐ हवा हमें बता दे......... ! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी, 13-04-2019

विरह गीत ( मैथिली कविता)

विरह गीत  मोर पिया परदेश बसै छथि ,हम विरहन बड़ ब्याकुल रे  तों जो  कागा  देश पिया के,  सात   समुन्दर   पार   रे।     तों जो कागा देश पिया के, हम विरहन बड़.ब्याकुल रे........... ! देख सिनुरिया  आम देबौ हम , देबौ  तोरा  बम्बई  रे चांगुर मे हम मोती बन्हवौ ,कांचन  सं चोंच मढ़वौ रे                        तों जो कागा देश पिया के ..............!  गौर वर्ण, मुख  चान पिया  के,सौष्टव अति  मन  भावन रे केशक शोभा की हम कहियौ,उमड़ि -घुमड़ि घन बादल रे                         तों जो कागा देश पिया के ............ ! चुप्पे बैसिहें  खिड़की पर तों ,कोइली  बनि तूं  गविहें रे मधुर स्वप्न मे हमरे देखथि ,केहन  पिया  मन  आनन रे                         तों जो कागा देश पिया के ..........

हम छी मैथिल (मैथिली कविता)

हम छी मैथिल  हम  मैथिल  छी, मिथिला वासी  गरिमामय  इतिहास   हमर   यौ नहिं फुफकार  काटै छी हमसब  अछि  नहिं  हमरा विष  दांत यौ                                फाटल पहिरी,  गुदड़ी  ओढ़ी                                खाइत  होइ  हम  खुद्दिये  यौ                               द्वार आयल  शत्रुओ  के  हम                                करै  छी खुब  आदर मान यौ वेद   पुराण  सभटा   पढ़ने   छि  अछि नहिं हमरा कुनु गुमान  यौ मातृ  शक्ति  के  पुजक  हमसब  करी  कन्याक खुब  सम्मान  यौ  ...

धरा की दशा (हिन्दी कविता)

धरा की दशा  दग्ध हृदय  तपते भाल  माथे पर ईंटों का बोझ  पीठ पर लादे भविष्य का झोला  सूखे झरने से  पीता है वह बचे खुचे शोणित की बूंदें  एक मरी है  दूसरा भी खड़ा  झोंपड़ी में एक गिद्ध  दिन भर की बुनी आशा  ले उड़ा सुबह उनका क्या हुआ  कौन देखने को खड़ा।  गिद्ध तो कब का न उड़ा।  ऐसी है धरा!  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 24-04-2019