टुकड़े टुकड़े आंसू ( हिन्दी कविता)

टुकड़े टुकड़े आंसू 

एक टक पलकों के किनारे 
फरफराते होंठों को निहारते 
टपकने को बेचैन आंसू
उनके अन्दर चमकता क्या है! 

तोड़ कर देखा मैंने
अरमानों की चिताएं थीं
टूटे हुए जिगर के टुकड़े थे 
आह भरी सिसकियां थीं
धधकती ज्वाला भी थी! 

सोचने को मजबूर किया 
कितने उमंग भाप बने होंगे 
कितने सपने चूड़ हुए होंगे 
कितना घुटन ढोता है यह बूंद !
कितनी व्यथाओं के
सबूत हैं ये आंसू! 
अपने को रोक 
थरथराते ओठों को मुस्काने को 
मजबूर किया है इसने 

हिम्मत कर , पूछ लिया आंसू से
कैसे ढोते हो इतनी ज्वाला 
व्यथा, घुटन और लाचारी 
क्या कहूं ,जिसके उर बसता हूं
इतना शीतल निर्मल है ,कि
मैं भी शीतल ही रहता हूं 
बाहर आकर भी अकसर 
पानी का एक बूंद ही रहता हूं
शायद ही कभी 
ज्वलनशील बन पाता हूँ!

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी, 28-03-2019

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