विरह गीत ( मैथिली कविता)

विरह गीत 

मोर पिया परदेश बसै छथि ,हम विरहन बड़ ब्याकुल रे 
तों जो  कागा  देश पिया के,  सात   समुन्दर   पार   रे। 

   तों जो कागा देश पिया के, हम विरहन बड़.ब्याकुल रे........... !

देख सिनुरिया  आम देबौ हम , देबौ  तोरा  बम्बई  रे
चांगुर मे हम मोती बन्हवौ ,कांचन  सं चोंच मढ़वौ रे
                       तों जो कागा देश पिया के ..............! 

गौर वर्ण, मुख  चान पिया  के,सौष्टव अति  मन  भावन रे
केशक शोभा की हम कहियौ,उमड़ि -घुमड़ि घन बादल रे
                        तों जो कागा देश पिया के ............ !

चुप्पे बैसिहें  खिड़की पर तों ,कोइली  बनि तूं  गविहें रे
मधुर स्वप्न मे हमरे देखथि ,केहन  पिया  मन  आनन रे 
                       तों जो कागा देश पिया के ............. !

उठिते  हुनका  चाह   बना क',  दी हें  तों  मोर  कागा  रे
विडियो, फोन सं विरह बढ़ैया',सानिध्ये  आव  औषधि रे
                        तों जो कागा देश पिया के ............. !

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी ,20-04-2019

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