आ पाबनि घुमि घुमि क'आबय (मैथिली कविता)

ई पावनि घुमि- घुमि क' आवय

        ( मकरसंक्रांति पर विशेष)

करि स्नान दी अर्धय् दिनकर कें
तिल  गुंड़ अर्पित अग्नि  देव कें
लाई- चुड़लाई  तिलवा कुर-कुर
फांकी   मुरही, चूड़ा   कुर-  मुर

          सभ के हम त' तिल खुआवी
          नहिं  ककरो पर भार चढ़ावी
          नहिं  बहै  तिल चिंता नहिं हो
          मात्र  हृदय  मे  जगह बनावी

खिचड़ी  पर  सं  घी के धार
ताहि उपर सं  पापड़ अचार
महिंसी दुधक दही पावि क'
धनियां चटनिक ली चटकार

          ई पावनि घुमि- घुमि क' आवय
          घर   समाज   में   प्रेम    बढ़ावै
          सभ  के  जुड़ै तिलवा आ' लाई
          वाल- वृंद   कें   गुड्डी-   लटाई!

प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
14-01-2019

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