दिव्याक दादी (मैथिली बीहनि कथा)
दिव्याक दादी ( मैथिली बीहनि कथा) दिव्या बड़ हठ क' देलकै। हम अमरीका जाइ सं पहिने पटना जयबे करब। प्रकाश बाबू के मान' पड़लैन्ह। एकलौती बेटी। आई .आई.टी सं पढ़ि अमेरिकाक एगो मल्टीनेशनल कंपनी में ज्वाइन कर' अगिला मास चलि जेतै। दिव्या अपन माय पापाक संग पटना पहुंचल। एयरपोर्ट सं टैक्सी बला के कहलकै “ अपने घर” बृद्धाश्रम चलह। जखन टैक्सी ओतय पहुंचलै त' माय पापा के कहलकनि ,” अहां सब एत्तहि रहू। हमरा एगो बृद्ध दादी सं भेंट करवाक अछि” ! प्रकाश बाबू दुनु प्राणी के गला सुखा गेलैन। आधा घंटाक बाद दिव्या कहलकै चलू। सब गोटे चलि पड़लाह। टैक्सी ठाढ़े रहै। टैक्सी चल' लगलै त' दिव्या प्रकाश बाबू सं पुछलकै, “ पापा अहां सबके अहि बृद्धाश्रम मे रहवा मे कोनो कष्ट नहिं ने हैत?” की बजैछी बेटा अहां? हम कियै बृद्धाश्रम में रहब। हमरा एतेक सुंदर घर द्वार, गाड़ी घोड़ा आ अहां सनक सुलक्षणी बेटी…! नहिं नहिं हम सोचलहुं जे दादी जखन एतय खुश भय रहि सकै छै त' अहूं सबके सुखे भेटत! तैं हम अहूं सब लय दादियेक बगल बला कोठरी आन लाइन बुक करा देलहुं। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,7-8-2020