नुकायल होली (मैथिली बीहनि कथा)

नुकायल होली
                                              (बीहनि कथा) 

हे यै.! यै..! फुस-फुसा क' नन्द रानी रतन कुम्मरि के जगबै छथिन्ह। अकचका क’ रतनकुम्मरि पुछलखिन। 
“की भेलैन दीदी! भोरे भोर कियै तंग करै छथि। “
“चुप चुप! “ठोढ़ पर अंगुरी राखि नंद रानी कहलखिन्ह, “यै रतनकुम्मरि चलु ने हमहुं सभ होली खेलैब। “
देखियौ त’! हे भगवान! ई पगला गेलखिन दीदी।  विधवा सब कत्तहु रंग अबीर खेलाई! 
एखने सभ गाम सं निकाल -बाहर करत,”रतनकुम्मरि बजलिह! “ बद्री कका के जनिते छथिन्ह," जिबते चिता चढ़ा देथिन्ह"!
लोक सभ बुझतै तब ने! हम सभ खुब मोन सं होली खेलैब आ’ भोर होइ सं पहिने पोखरि मे नहा सोना क’ चलि 
आएब। एखन हमर सभक उमेरे की भेलै! पैंतिस -चालिस कोनो उमेर होइछै। 
सधवा सभ त’ देखियौ एहि उमेर मे उधियैल फिरै या! हम सभ विधवा भेलहुं त दुइर गेलहुं। 
दुनू एक दोसर के खूब रंग -अबीर लगौलैथ आ लोक सभ के जागै सं पहिने, पोखरि जा, रगैर-रगैर क’ नहा धो 
क’ घर आबि जाय गेलिह। 
ओमहर बद्री कका भोरे जखन पोखैर नहाय पहुंचला त’अजगुते लीला। 
घाट घिनैल आ’ पाइन रंग स घोंकल! गोंहछैत बजलाह, “जरुर ई बैजुआक उकट्ठ छी। ठहरह आइ तोंही कि हमहीं। 

प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 21-03-2019

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