के बनौलक हमर चश्मा (मैथिली कविता)
के बनौलक हमर चश्मा
ताकि रहल छी
भोरे सं हम
के बनौलक हमर चश्मा
अह्लादित छी
उत्साहित छी
बड़ दीव अछि
बड़ बिचित्र अछि
जेना एक्सरे मशीन!
सभ सं पहिने
अपने दिश घूमल
घृणा, छल, कपट सं भरल अन्त:
कर्ण जेना नोचि फेकलथि कवच कुंडल कें
हमहुं फेक क’ अएलहुं बाहर
दुनियां त’ बदलल बदलल!
बौआ बौआ जे सभ रटै
लोभी एक नम्बर के निकलल
बाबू बाबू कहै वला सभ
बरका ठकहा जीव !
सर सर कहि कहि हुकुम बजावै
चमकैत छूरा, खोंसने ढ़ीठ!
जिज्ञासा बस सभ के जंचलहुं
भाय’ बहिन तक के नहिं छोरलहुं
कतहु जल, निर्मल नहिं भेटल
हारि क’ चश्मा माय’ दिश घुमल
चट छाती सं हम जा लगलहुं!
यैह छी स्वर्ग! यैह छी स्वर्ग!
केहन चश्मा अहां दीव बनौलहुं!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी, 11-04-2019
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