अक्षर (हिन्दी कविता)
अक्षर
हे अक्षर! हे अणु!
तुम ब्रह्म हो, रचते हो
तो ब्रह्मास्त्र क्यों हो
तुम सूत्र हो , बनाते हो
जोड़ते हो,तोड़ते क्यों हो
बन्धन में बांधते हो
तुम्हीं तो मंत्र हो
जोड़ने का मंत्र दो
तुम्हें जोडूं ,राग बनाऊं
जड़ चेतन को झुमाऊं
गीत लिखूं ,पंक्ति रचूं
वालक बृद्ध सबके भाल चमकाऊं
सब को दुलराऊं
गर्मी, जाड़ा, वर्षा,बसंत
शिशिर हेमंत,
ऋतुओं के सुर बन जाऊं
दुलराऊं, हिलराऊं
युबक-युबती के हृदय में पैठ
धरकूं , ईठलाऊं ,ईतराऊं
कभी कोमल, कभी निर्मल
कभी चंचल बन
आंखों में पैठ शरमाऊं
सबके जिह्वा पर बैठ
होंठों को सहलाऊँ ,मुसकाऊँ
मां की ममता, पिता का प्यार
भाई-बहन का पुचकार
दादा-दादी, नाना-नानी के
किस्सा, कहानी में बैठाकर तुम्हें
लोरी बनबाऊं
अतः हे अक्षर!
हे रचयिता, तुम तो
अजस्र हो, अजर हो, अमर हो
रचना का मंत्र ही रहना
विनाश का सूत्र बनकर
संहार न करना!
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी 11.02.2019
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