चिड़ईक चिंता ( मैथिली कविता)
चिडईक चिंता
एक छै चिड़ि, एक चिड़ै
एक छै खोंता, दुटा बच्चा
चीं चीं चूं, वाप रे वाप!
नहिं बाज तुं!
कियै गे माय’! पुछै ऊ!
हे यौ बाबू! हे गै दैया
ई दुनियां छै बड़का झूठ!
जे देखै छी,ओ नहिं ओहन
सभ के उल्टा पुल्टा रुप!
देख देख तु,! ऊ’छियै कौवा, कांऊ काऊं काऊं
जे किछु लैव ,झपैट ल’ जैत
नहिं त’ चिल्होरि के जा सुनैत
ऊ’ देखु बाबू ,वैह छी चील !
कांकोर सन चांगुर ,चुट्टा सन चोंच
झट उड़ा जैत , खा’ लेत सौंस!
‘ऊ’ के माय'
ऊ छी लोक
ज्ञानी छी, ध्यानी छी
छी दयाक प्रतिक,कहै छै
हे नेना सभ ,सुनि लिय’ चुप्पे चाप
बड़ धोखेबाज ई
कखनो दुलार, कखनो प्यार
दोसरे क्षण मारि क’ खाजैत
करत ढ़कार
तैं यौ बाबू! हे गए बुच्ची
हमर दुलारु, चुन मुन चुन
पंछी बनी’ ,सब चाहैत अछि
चिड़ई के दु:ख
के जनैत अछि!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पॉंडिचेरी, 25-03-2019
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