स्वागत हे युवराज बसंत (मैथिली कविता)
स्वागत हे युवराज बसंत
बुढ़िया मां छथि कहा पठौने
अबै जाई जाउ हम्मर द्वार
के सभ कोन ओरियान मे लागब
क’ ली आई सेहै बिचार
रे कोइली तों बता
तोरे देने छलियौ भार
सभ के तों त’ कहि ऐलही ने
लागल नहिं हेतहु आव जाड़।
हे कोइली तों गीते गबिहैं
मैना, बगड़ा, बुलबुल, परवा
तों सभ मिल क’ झाइल बजबिहैं
रे हंसा तों बीणा तनिहैं
हे लुक्खिया तों थपरी पिटिहैं।
गाछ-बृक्ष के हवा के भारा
आवि रहल अछि हमर दुलारा
दस मासक यात्रा बड़ भारी
स्वागत करू सब नर-नारी।
अमलतास तों माला बनिहें
कचनार बनि जायत धोती
गुलमोहर के पागक भारा
रे गुलाब तों सौरभ बटिहैं
आम आ’ महुआ चंवर डोलाओत
युवक-युवती सभ नाच देखाओत
भंवरा के त' जागल भाग
मौधमाछी सभ मौध बनाओत।
आई भोर मे हमरा भेल भास
क्यो ठकठकेलक हमर द्वार
सूर्य किरण के रथ पर चढ़ि क'
आवि ठाढ़ रहथि,बसंत कुमार।
शिशिर के भ गेलैन्ह तैयारी
जाइये रहल हुनक सवारी।
तखने कुंवर सिंहासन बैसता
भेटतन्हिं ऋतु राजक पदवी।
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 04-02-2019.pramod_drpk@yahoo.co.in
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