पुष्पक गति (मैथिली कविता)

पुष्पक 'गति'

अहि बेर 'ओ' पुछलनि
की बनब'
झट द कहलियनि
फूल बना दिय'
फुलबारी बसैब
रंग-बिरंगक रुप धरि
ललना के लहड़ैब!

बुझलहुं नहिं, पर
कियो झुलैत 
कियो डोलैत 
कियो दिनभरि गों गों क'
गीते सुनैत।

मूर्ति पर चढ़बै लै
सेज सजबै लै
जूड़ा मे गूंथै लै
त केओ चिता पर 
चढ़बै लै, जरबै लै
वा, नहिं त' 
वीरक पथ पर
ओछवै लै
तोरि ल' जैत।

हम कानी, खिझी
नहिं-नहिं, दया करु
हमरा सुगंध पसारैक अछि 
वायु रथ पर  चढ़ि
दश-दिशा गमकबैक अछि 

मुदा के सुनैया!
झकझोरि तोरैया
अपन पथ सं मोड़ैया 
पुछितो नहिं अछि
दर्दो भेल ?
की सोचलहुं 
आ की भ' गेल !!

प्रमोद कुमार, उर्फ "नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
दि.28-12-2018
रात्रि-10.35बजे

Comments