धरा की दशा (हिन्दी कविता)

धरा की दशा 

दग्ध हृदय 
तपते भाल 
माथे पर ईंटों का बोझ 
पीठ पर लादे भविष्य का झोला 
सूखे झरने से 
पीता है वह
बचे खुचे शोणित की बूंदें 
एक मरी है 
दूसरा भी खड़ा 
झोंपड़ी में एक गिद्ध 
दिन भर की बुनी आशा 
ले उड़ा
सुबह उनका क्या हुआ 
कौन देखने को खड़ा। 
गिद्ध तो कब का न उड़ा। 
ऐसी है धरा! 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 24-04-2019

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