आशा ( मैथिली लघु कथा)

आशा 
                                 (लघु कथा) 

खट... खट....! खट....! 
खट..........! खट.....! 
हे भगवान! आव ई के आएल! अहि भोरहरवा मे! 
हो न हो, फेर वैह हैत! आर के भ’ सकैये। दिन भरि त' परेशान कैनहें रहैयै, राइतो क’ या भोरहरवो मे कनि बकैस देत से नहिं। 
खट…!खट... खट....! 
ओह! मोन करैयै जे अपने स’ माथ नोईंच ली! ठहरह तों! तोरो अहि वेर मजा चखबै छियौ। 
खटखटवैत रह’! तों थेथ्थर त’ हमहूं थेथ्थरे भला! 
खट खटाब’! जत्ते मोन होइ छ’ तत्ते! 
फेरो वैह!!!! खट... खट.... खट...! 
दुनु हाथे माथ पकैर क’ बैस गेल बिलटा! बाप रे! ई “बिपत्तिया “हमरे पाछां कियै पड़ल अछि! 
सभटा त’ दैत जकां हुड़लक। खेत, पथार, माल-जाल, रूपैया -पैसा! 
एगो बेटो छलै सेहो.... 
देह मे कनि गुद्दा बँचल अछि, लगैया’, पहिले गुद्दा नोचत आ तेखन खूनों चुसिये लेत !
खट...! खट...! खट....! खट....! जेखन बरी काल धरि केबार खटखटाइते रहलै , त’ बिलटा के आभास भेलै जेना, “ई आवाज त’ अनठिया जकां बुझाइछै। के भ’ सकैयै’! 
तखने आवाज ऐलै। नहिं खोलबैं! आखिरी वेर कहै छियौ। 
हम छियौ तोहर आशा। 
आशा! के आशा! 
हम कोनो आशा -वाशा के नहिं जनै छियै। 
तोरा धोखा भेल’ है। जाह! दोसर द्वार। 
नहिं नहिं। केबार खोल न’ बिलटा! हम सच कहै छियौ। 
बारह बरख सं पोशने छैं हमरा आ’ कहै छैं जे नहिं चिन्है छियौ !
आशा जखन बड़ खेखनियां कैलकै त बिलटा आखिर केबार खोलिये देलकै! 
देखलक त’ दरवज्जा पर क्यो नहिं। ओह लगैया जे मोन बाजै छल। बिलटा सोचलक मोने मोन! 
एकटा बड़का चिट्ठी! के ठकठका क’ फेक गेलै से पता नहिं। लिखल रहै-“बाबू! हम परसू आवि रहल छी। आव अहां के कोनो दुख नहिं रहत। हम बड़का बिजनिस मैन भ’ गेलहुं अछि। “
अहिंक बेटा “लखना “।
बिलटा सोच’ लागल, “सभ कहै छलै आव श्राद्ध क’ दही। बारह बरख सं बेसी भैलै। लखना छोट छिन बात लै घर सं परा गेल रहै। 
सभ निराश भ’ गेल रहै मुदा बिलटा के आशा रहै जे एक ने एक दिन हमर बेटा अवश्य ऐत। 
से आशा आव पुरा हेतै! कठोर भेल हृदय पिघललै आ’ आंइख भैर गेलै!

प्रमोद कुमार उर्फ “ नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 14-02-2019

Comments