चिड़ैयक चाह (मैथिली कविता)
चिड़ैयक चाह
एक चिड़ैया
फुनगी पर बैसल
चिड़ी खोदियाबैत देह
चिड़ै तकैया'
दिग- दिगंत
किम्हर हमर देश!
युग बितल
छोड़ि एलहुं अपन
माइट, पाइन ओ भेष
ननमुन सभ के
पांईख भेलै
भरलै हवा अशेष
क्षितिज के छुअब
अपने रंग
अपने ढ़ंग
मुदा सभ के एके तरंग।
चिड़ै के खोंता
बड़ दिबगर
धनहर खेत
खेनिहार कहां
स्वादहीन
अन्न ओ ब्यंजन!
चलू हे चिड़ी
खसले मड़ैया मे
खोंता बना लेब
क्यो चिन्है वा नहिं
मगर वैह माइट
वैह पाइन
पांईख सं लगालेब
रोम-रोम मे
नव प्राण त' जागत!
लोहारक धौंकनी
हरवाहाक घुरकी
चरवाहाक चुरकी सं चुबैत तेल
कंसारक मुरही
आंकड़ पाथर
फुदुकि-फुदुकि फांकब
काटि लेब जीवन शेष!
प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास"
पान्डिचेरी
दि. 25-12-2018
( हमर धर्म पत्नी श्रीमति कल्पना कुमारिक जन्म दिनक पुर्व संध्या पर सस्नेह भेंट)
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