ये कैसा गणतंत्र है ( हिन्दी कविता)

ये कैसा गणतंत्र है

गण है, तंत्र है
यंत्र भी है
मंत्र नहीं है
राजतंत्र है! 
गण तो यंत्र बन गया
सोचता नहीं है
कम्प्यूटर जैसा
प्रोग्राम से चलता है
हमरा गण भी
ट्युनिंग से चलता है!
यहां तो वंश पर वंश पनपता है
रोटी का टुकड़ा
बांट बांट कर
जन को भक्त बनाता है
खुद भगवान बनता है!
मंत्री है, संत्री है
तंत्री है!
सभ स्वतंत्र है, गणतंत्र है!
जन ही बस परतंत्र है।
नव राजतंत्र है!
सुना था
राजा भला करता था
प्रजा का
ये राजे तो
चूसते हैं,लूटते हैं
ठगी का चैम्पियन हैं
जनता का ही
जानता के नाम से खाते हैं!
गण का नर्क है
गणपति का स्वर्ग है
सभ तंत्र है!
गणतंत्र नहीं है
भूख है,प्यास है
अन्न है,जल है
भुखमरी है!
खेत है, खलिहान है
मकान है, दुकान है
कल है, कारखाना है
बेरोजगार है!
यंत्र है, तंत्र है
मंत्र नहीं है
गणतंत्र नहीं है!

प्रमोद कुमार उर्फ "नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी
दि.26-01-2019

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