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Showing posts from March, 2020

महा दानी

                    (स्वर्गवासी पिता श्री महावीर लाल दास को समर्पित) सदा चलाया  पकड़  अंगुली  वो जबतक भुवन का भार मिला था खड़े  अम्बर  के  बीच आज भी स्वर्ग  से  दिशा  दिखा  रहे हैं।                  शांत, शुद्ध, सिद्धहस्त  सारथी                  गुण  के   आगर   महावीर  थे                  झूठ, द्वेष, प्रपंच, ईर्षा के दुश्मन                  सत्य  ईमानदारी के प्रति मूर्ति थे। नहीं  थके न झुके कभी वो ‘कर्म  ही पूजा’  मंत्र बनाया अडिग खड़ा प्रतिकूल वायु में विद्या का अमर दानी थे वो।                    बने  स्नातक  ऐसे  युग  में              ...

सूतल राजा, मरैत प्रजा

                हे भगवान खोलू आंखि जकरा देखि देखि भाल चमकैया वैह चमकी सं मरि रह’लै नित दिन गिनती बढ़ले जाइयै क्यो निरीक्षण कर’  अवैया' क्यो रिपोर्ट झट मंगवैया ए .सी घर ए. सी  कार शान ओ शौकत के ब्यापार ब्यापारी ई राजा बड़का दय आश्वासन चमकी गोल किछु टाका छै लू के मोल पाई फेक क’ चलैत बनैत अछि चमकी सं मरैया बालक युवा वृद्ध के खाइया लू हे ईश्वर अहां की करै छी की अहूं छी बैसल एसिये मे छोड़ि आलस अहां बाहर निकलू बुझवै जखन लागत लू! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 18-06-2019

बाल गोपाल

                                      हे  नन्द लाला बाल गोपाला आजा मेरी बगियन में मैं बन जाऊं माखन तेरा लिपट जाऊं तेरे आनन में या बनाकर  मिसरी  की डलिया तेरे मुख घुल जाउं जनम जनम  की साध  हो  पूरी तेरे में मिल जाऊं                     या बन जाऊं घट  माखन का तेरे कर फुट जाऊं मैं                     खेलें तेरी  अंगुली जिसपर  बंसी वही  बन जाऊं मैं                     अपनी बंसी का धुन बनाकर मन में ही रख लेना तूं                     या  मुझे बनाकर डोरी कदम्ब पे झूला डाल लेना तूं मैं  बन  जाऊं कदम्ब  की डाली  धुन मुरली की छेड़े तू तुम्हें   देख  नाचेंगी  गोपियां   मेरे  मन  में...

कोना हम मृत्यु पर नाचू

    छाती फाटल हमर ओहि दिन           निर्भयाक जहि दिन प्राण गलै। चारि टा जीव टंगा गेल भोरे           ओकरो प्राणक अवसान भेलै। एकटा टांग टुटल ओहि दिन            दोसरो आइ टूटिये गेल भाई। हम संसारिक,  नहिं छी मसानी            नाचू कोना क्यो दिय' बताय। करोड़ों असुर देवता सब मारलथि           रावण संग लाखों मारलथि राम। फेर करोड़ों मरला महाभारत मे          तैयो नहिं बदलल अछि परिणाम। मनुख मात्र एक जीव बनल अछि          सोच विचार के छोरि चुकल अछि। भाय बहिन नहिं सूझै छै ककरो           मात्र स्त्री पुरुष मे बंटा गेल अछि। कलयुग जेना चोटी चढ़ल अछि             प्रलय निकट  देखा रहल अछि। हमत' देख रहल छी भाई सब            सबहक गरदनि टंगा रहल अछि। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,20-03-2020

काकी गीत

                            (मित्र लोकनि, हम एकटा गीत लिखवाक प्रयास कैलहुं अछि। अहि गीत मे ओहि तरहक ब्यक्तिक मनोभाव परिलक्षित कैल गेलै, जे वर्षों पहिने जीवन यापनक क्रम मे गाम छोरि परदेशी भ’ गेलाह। बाल -बच्चा सभ पढ़ि -लिखि, विवाह दान कय आन आन ठाम जिवन जी रहल छथि। आव ई दुनु गोटे बूढ़ आ असमर्थ भ’ गेल छथि। प्रतीकक रुप मे कौआ के अपन मोनक उद्गार सुनवैत अत्यंत बृद्ध अपन काकी के संदेश पठवै छथिन) काकी भेजलहुं हैं कौआ के गाम यै                                 कनि बथुआ पठा देब पठादेव काकी सेरसो के साग यै                                 कनि पटुआ पठा देब । तिलकोरक पात भेजु, भेजू एरकंचन -2             भेज दिय’ मुंगरी माछ यै                                कन...

माधव कोना कठोर

          माधव   अहां  कोना  एहन  कठोर अहां  शीतल   श्रीखंड  छी  माधव हृदय  माखन  सन  उज्जर  कोमल आरक्त नयन अछि कमल द्वय तोर                  माधव अहां कोना एहन कठोर ! साउन   बितल  शरदो  चलि  गेल भरल   चातक  नयन  अछि  नोर ताम   झाम  संग   बसंत  अएला नाचैत  अछि  हमरो  मन  मे मोर                माधव अहां कोना एहन कठोर ! अछि  अहांक  कुंतल उमरल घुमरल भान  होइछ   सद्यहिं  बादल  जोर सुमन  सौरभि  सं  भरल पूरल अछि सुषमा  सं  आंचर  भरि  दिय'  मोर                   माधव अहां कोना एहन कठोर ! मज्जर  गमकै   छै  कोइली  कुहुकै सुर   पसरल   छै...

अव कोई क्या करे

चावल नकली है नहीं खाना शब्जी खाध वाली है नहीं खाना लोग बेइमान हैं बच के रहना करोना फैल रहा है हाथ मत मिलाना घर में बंद रहना पानी गंदा है नहीं पीना क्या करे मानव अव कहेंगे सांस मत लेना हवा जहरीली है जिंदा ही मर गया मानव! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,04-03-2020

चैता

              (मित्र लोकनि, अहि आफतक काल मे चैती के कनि दोसर रुपें प्रस्तुत कय अहां सबकें हंसेवाक प्रयास कैलहुं अछि। कते तक सफल भेलहुं से त' अहीं सब कहब) केहेन बताह मोर पियबा हो रामा                                               चैत महिनमा ! रहि  रहि  हमरा  फोन लगवै छथि-2 खने  खने  विडियो  कॉल करै छथि मौसरी उखरि आएल अंगना हो रामा                                             चैत महिनमा ! भैंस  द्वार  पर बान्हि ओ  गेलाह कतेक  दूध  भेल  रहि रहि पुछता छाल्ही निकालि लेब पहिने हो रामा                                             चैत महिनमा ! गाछी जा  क'...

पेड़ हूं

पेड़ हूं, खड़ा हूं जड़ हूं, पर चेतन हूं शाख हूं, खोढ़र हूं घर हूं, घोंसला भी हूं डाल हूं, हवा करता हूं उसके संग खेलता हूं पत्ते हूं, छाया करता हूं पशुओं का भोजन हूं फल भी हूं मुक्त हूं मुफ्त परोसता हूं एहसान नहीं मानता झुका ही रहता हूं खड़ा हूं युगों से झड़ता हूं, फिर पनपता हूं मारते हो, मर जाता हूं फिर जी जाता हूं जन्तुओं की सेवा का धर्म अपनाया है इसीलिए मर मर कर जी उठता हूं। प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 05-03-2019

प्रेमक बन्हन नहिं टुटै

प्रिय! सुनै छी की.. कहू ने सुनिते त' ऐलहुं अछि हे ! दुखी नहिं होउ कनि सुनि लिय' अचछा कहू! एना ब्यग्र कियै छी? कतेक जोर सं हाथ पकरने छी दुखाइया! कहलहुं जे मोन बड़ व्यग्र अछि रोग त' कोनों नहिं तखन कियै ? कहै छी अहां के… गीत संगीत मे मोन लगाउ शांति भेटत ! हे ! पाठ नहिं पढ़ाउ कानक कुंडल चमकबैत रहू चूड़ी खनकबैत रहू वैह हमर गीत वैह संगीत गांठक जोर सक्कत कयने रहू हे हमर प्रेम! हृदय मे हरदम बसल रहू! डॉ. प्रमोद कुमार पांडिचेरी,14-02-2020

की हम वैह पुष्प छी

    रंग हमर अछि ओहिना शनगर               लाल गुलाबी बुल्लू पियर उपर अम्बर ओहने विशाल             बुल्लू चद्दरि ओढ़ने निहाल निचा धरती हरियर पसरल          तितलिक पांखि फर फर फर फर भौंरा  गावि रहल अछि गूं गूं             माइल पानि पटाबथि गर गर मालिन हाथक फुलडाली गोल                माला के नहिं कोनो मोल रमणिक गजरा गोल भेल अछि            पूजा पाठ तक बन्न भेल अछि मंदिर क्यो नहिं लय जाइत अछि      की भेलै मनुक्ख के नहिं फुराइत अछि  प्रभु चरण मे अर्पित भय हम                                चरम आनंद पावि लै छलहुं नहिं पुजेगरी आ नहिं प्रेमी               नहिं श्रृंगार मे लागल प्रेयसी      क्यो नहिं  वन मे आवि रहल अछि ...

उड़ान

      खोढ़र से निकलने का आतुर क्षण परों को तौलने का व्याकुल मन! परखा तो हवा भरी थी परों में उन्होंने पूरी कोशिश की थी खूब ऊर्जा भरी थी भर दिया आज उड़ान मैंने मन में उमंग है तन में तरंग है वृक्षराज के फुनगी को छुउंगा मैं पर्वत राज के मस्तक को चूमूंगा मैं  होड़ लूंगा हवा से बादलों के पार जाऊंगा सोचता नहीं हूं भूख की, प्यास की गगन में उन्मुक्त विचरण का आनंद मनाऊंगा, गुनगुनाऊंगा मैं उड़ा हूं उड़ता ही जा रहा हूं क्षितिज को छुउंगा गति बढ़ा रहा हूं वह लाल बड़ा गोला ! क्यों भाग रहा है ! जल्दी जल्दी हमसे तेज फिर भी उड़ रहा हूं कहां है क्षितिज की सीमा! उसने पंख तो दिए मगर क्षितिज को अंतहीन बना दिया! प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी ©सर्वाधिकार सुरक्षित

मायक मोल

      आई बिसुखि गेल हमर गाय' कतेक संतान के जन्म देलकै मोनक मोन दूध बहौलकै खून चुसेलै, आंइख घिचेलै कहां कोनो ऊ ध्यान रखलकै हम सभ पोसेलहुं मोट सोंट भेलहुं सबटा बड़द बड्ड सुडौल हरवाह बहलवान के मुंह चमकौल कत्तेक बाछी आन गाम वासी साक्षात कामधेनु कहि सभ गुण गाओल आइ खुट्टा पर बान्हल अछि बीमार ऊ गाय हमर त’ मानू वैह छी माय माय आ ओकर भाषा एक्के समान आई बिसुखि गेल त’ करू अपमान? माय के मान आव भ’ गेल सामान? दूध देत त'सम्मान आ नहिं त’ अपमान! आई हमर ‘ई' केहेन ज्ञान??? प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पॉंडिचेरी, 05-02-2019

चौबटिया

      हे चौबटिया तीन बाट त’ देखल आव चारिम बाट देखाउ ने जन्म लेल,सभ माथ चढ़ेलक अति दुलार,प्यार सभ कैलक ईश्वरक त रूपे बनलहुं कत’ की भेल,किछ नहिं जनलहुं चट शैतानक पदवी पौलहुं चटकन, मुक्का, भेट' लागल भरि दिन दौरी, भरि दिन हांफी क्यो निरसै, त' बौंसै क्यो क्यो आव दोसर राह पकरायल हमरा शरीर मे हृदयक बोध भेल बरका कखनों लाल कखनो पियर दुनिया हमर मिठगर नोनगर कपार मे सटल कुदि क हमरा कपूत, कुपिता आ' कुपतिक पदवी आगां घुमलहुं, पाछां घुमलहुं वाम दहिंन सौंसे भ’ अएलहुं तेसर राह ओनाहिंयें बितल चौबटिया पर आवि ठाढ़ छी हे चौबटिया अहीं बताऊ चारिम वाट कोम्हर द’ जाउ अहीं शरण मे आबि बैसल छी स्वर्ग, नर्क आ’ पृथ्वी बास सभटा भोगि तजल सभ आस मुक्तिक मार्ग शेष बंचल अछि हे! चौबटिया वैह बताउ हे! चौबटिया वैह देखाउ! प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पॉंडिचेरी, 29-01-2019 pramod_drpk@yahoo.co.in

नाथ, अनाथ !

हम दिनकर, दिवाकर, भास्कर हम दीनानाथ, अनाथ! दौड़ते रहै छी भाइगते रहै छी,तैं हम गोल छी, लाल छी छी धधकैत लहकैत ज्वाला भोरे जगबै छियै बात कथा सुनै छी। नहिं बरसलै बादल नाम लागल हमर सभटा जरा देलकै! कनियां काकी पारलन्हि अदौरी बदरी लाइद देलकै बदनाम भेलहुं हम रौदे नै उगलै ! जारक मास कुहेश लदलकै जारे सभ ठिठुरै बदनामी हमरे कपार दिनकरो बुढ़ा गेलै कत्ते गरम छलै आव ठंढ़ा गेलै! ऋतु बदललै गृष्म पसैर गेलै घाम चूलै भोरे भोर लोक सभ चिचियैल केहन निर्दयी छै ई सुरुजो भोरे जड़ब’ लगै छै। जेठक दुपहरिया मुर्छित भ’ खसलै बटोही हे! दिनकर कियै मारै छहक! खापरि फुटल हमरे कपार! सभ सं दुलारी धिया हमर नाम देलियै पृथ्वी ! नाइत,नातिन त’ कोइसते छल आव ईहो कहैया’ जहिया सं जनम भेल नचेनहें छी आव की करू! नाथ हम! अनाथ छी! प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरु लाल दास “ पांडिचेरी, 16-02-2019

पेड़ हूं

पेड़ हूं, खड़ा हूं जड़ हूं, पर चेतन हूं शाख हूं, खोढ़र हूं घर हूं, घोंसला भी हूं डाल हूं, हवा करता हूं उसके संग खेलता हूं पत्ते हूं, छाया करता हूं पशुओं का भोजन हूं फल भी हूं मुक्त हूं मुफ्त परोसता हूं एहसान नहीं मानता झुका ही रहता हूं खड़ा हूं युगों से झड़ता हूं, फिर पनपता हूं मारते हो, मर जाता हूं फिर जी जाता हूं जन्तुओं की सेवा का धर्म अपनाया है इसीलिए मर मर कर जी उठता हूं। प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 05-03-2019

बूंद बूंद मे उलझी जिन्दगी

              बूंद हूं बूंदें हूं लकीर हूं धार हूं, बहता हूं नदी हूं,  समुद्र तक जाऊंगा जाता हूं, फिर वाष्प हूं उड़ता हूं, बादल बन बिचरता हूं फिर बूंद हूं गिरता हूं गिरने उड़ने में फंसा हूं डोर से बंधा हूं कठपुतली हूं नचाता है नाचता हूं। प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 05-03-2019

चिनगी उड़तै

चिनगी उड़तै जिनगी बनतै बढ़ैत चलू हे! पथिक जनै छी पथ बड़ कठिन अछि कांट बिछैल अछि कीच सं पाटल अछि रोड़ा पाथर पड़ल अछि वसन ताड़ ताड़ भेल घामक धार भेल औंठा फुईट शोनितक धार भेल गन्तव्य अपार भेल निराश छी! हतास छी अहां! चलू, चलैत रहू पाथर सं पाथर भिरतै चिनगी उड़तै कीच बनत दीप  अहांक, हिम्मत बनत बाती प्रकाश पसरतै चिनगी उड़तै जिनगी बनतै डेगे डेग बढ़ैत रहू चलैत रहू हे साथी! प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 16-02-2019

बनि जाइ कागज पर रेखा

नहिं बनी हम बिच धार मे बहैत नाव के खिंचल रेखा आ नहिं बनी हम अकाश मे उड़ैत राकेटक बनैत मिटैत उज्जर रेखा नहिं चली खिंचल रेखा पर लीक पर चलैत बड़द जकां जीवन भरि हरपेटा खाइत नित नव बहलमान के समर्पित अपन जीवन जकां ! नहिं बनैब हमरा हे बिधना दू देशक बिच खिंचल रेखा किन्नहु नहिं बनी हम परिवार के बांटैत…. लक्ष्मण रेखा हे बिधना ! जं बनौलहुं विधि सं अहां नहिं व्यर्थ होइ, किछु अर्थ दिय' कागज पर रेखा बना क' खिंच दिय' किछु अर्थ भरु नहिं व्यर्थ करू जॅं विशिष्ट छी,  मानव छी ! त' कनि मोसि दिय' कलम दिय' कागज दिय' खिंच रेखा हम अर्थ भरी ओहने हमरा अहां कर्म दिय' !! डॉ. प्रमोद कुमार पांडिचेरी,27-02-2020

परिवार

        एक खढ़ दोसर खढ़ तहि पर सं तेसर खढ़ घाम पसेना तर बतर टप टप टप, टप टप टप हार पांजर हिलै छै नहिं पसेना पोछै छै उड़ उड़ उड़ फुर्र फुर्र फुर्र एकटा घर बनै छै चिड़ी चिड़ा मुस्काइ छै दूटा अंडा गोल गोल चिड़ी चिड़ा के मिठगर बोल आइ जे सुन्दर भोर भेलै चुन चुन चुन अनघोल भेलै आइ अपन परिवार भेलै केहन  दीव संसार लगै चिड़ी के मन अह्लाद भरल चिड़ा के उर अनुराग भरल ! नाचि रहल छै पत्ता पत्ता गाछक त' सब दुख निपत्ता ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,27-03-2020

गहना

          अहां  बजै छी ,  कोइली  रुसि  जाइछै हंसै छि अहां जखन फुल खिल जाइ छै हंसक  चालि  अहांक  जान ल' जाइयै हिरणिक  चक्षु  अहांक  नचबैत रहैया'                    हे यै हमर गहना, चमकैत रहू ने! दांतक  पांति  जेना मोतियक  माला ठोढ़क  लाली   जेना  हो  मधुशाला मुखक शोभा  एहन चान  मुंह झांपय कुंतलक  केलि  जेना  नीरद  नाचय !           प्रिय अहीं हमर गहना, उमकैत रहू ने ! घर अछि चमचम पायल बाजे रूनझुन दुनु कानक कुंडल चमकै बड़ चम चम उतंग  पयोधर  मातल  अहांक यौवन अहीं  हमर  तिलक अहीं हमर चानन                 हे यै हमर स्वामिनी,हुलसैत रहू ने! भोर  मे उगल दिनकर  सांझ मे डुबत चानो ने  राति  भरि संग अहांक पुरत चलु  एतवा करी  हम सब संग ने छुटै दुनु जे गांठ  बान्हल ...

क्षणिकाएं

              1. चुट्टी बनौलहुं चुट्टी चिन्नी उघै छी त' कोंढ कियै फटैया'! 2. कठ खोदी हे काठ खोदैछी! लोल टूटत ! चुप रहू गड़ार ओहिना नहिं भेटै छै! 3. बगरा हे देखियौ बगरा के केहन बढ़ियां फुदकै छै ऊंह! छान लागल अछि नहिं त' अखने फुर्र ! 4. बगुला फोकट मे त हमहूं माछे खाइ छी हम ओहने के ओहने नेता कियै फुटबॉल? डॉ. प्रमोद कुमार पांडिचेरी,28-02-2020

जीवन का झरना

निर्झर बहते झरने का जैसे श्रोत ही सूखा जाता है था जीवन अपनी नदिया जैसी कल कल निनाद कर बहता था। कुलांचें भरता था छौना जैसा बादल सा उन्मुक्त यह उड़ता था चिड़ियों सी जैसी चहक थी इसकी मृदुल गंग धारा बहता था । हिम राज सा था मनोबल मृदुल मधुर आचार थे सबके नित दिवाकर हंसकर उगता था थी रात को चन्द्रिका राज करती । कोयल की कूक गुंजे कानन में शहनाई कर्ण में मधुर घोलते थे राह चले मिल जायें अपने हंस हंस कर गले मिलते थे । भूख अधिक या प्यास प्रबल हो चिंता नहीं सताती थी भूखे पेट सो जाते थे फिर भी नींद बहुत ही आती थी अव तो झरने सूख गये हैं नदी न नीर बहाती कल कल हवा गर्म दुर्गंध भरा है जीवन बस घिसटता है पल पल । डॉ.प्रमोद कुमार पांडिचेरी, 02-03-2020

अव कोई क्या करे

चावल नकली है नहीं खाना शब्जी खाध वाली है नहीं खाना लोग बेइमान हैं बच के रहना करोना फैल रहा है हाथ मत मिलाना घर में बंद रहना पानी गंदा है नहीं पीना क्या करे मानव अव कहेंगे सांस मत लेना हवा जहरीली है जिंदा ही मर गया मानव! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,04-03-2020

होली के हुड़दंग

   एक हाथ मे रंग लेने छथि एक हाथ पिचकारी गली गली मे घुमैथ कान्हा ताकैत राधा प्यारी ।                         जोगिरा सारा रा रा ! ढ़ोल मजिरा बाजि रहल छै बजै छै मृदंग कान्हे संगें नाचै सबकोई मचल छै हुरदंग                    जोगिरा सारा रा रा ! क्यो मारै पिचकारी पिच पिच क्यो उड़वै गुलाल युवक युवती मौज मनावै बुढ़वा भेलै बेहाल                   जोगिरा सारा रा रा ! पुआ पुरी खाकऽ सबके पेट भेल छै टंच उपर सं भांगक गोला दऽकऽ नाचै छमाछम           जोगिरा सारा रा रा ! के अमीर के गरीब छै भैया के उंच के नीच सब त' एक्कै रंग रंगल छै होली छै बड़ नीक          जोगिरा सारा रा रा ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,09-03-2020

रे करोना भाग तों

रे करोना भाग तों चोर जकां तू अएलैं रौ चोरे जकां भागि जो तू नहिं त' डांग देखै छिही बड़का बुझि लेबौ हम मरुआ पुत्ती सुखा देबौ हम रौद में मारि डांग हम झारबौ तोरा साबुन सं लेबौ हाथ धोय नेवो पानि पिवौ भरि पेट नहिं भगबैं त' जेबैं मरि हम छी हिन्दुस्तानी व्यबहार सनातन हमर रौ नहिं ककरो सं हाथ मिलेबौ दूरहि सं करबै नमस्कार प्रणाम मेला ठेला हम नहिं जयबौ धिया पुता के छुट्टी द' क' किछु दिन ले आराम करेबै करि आराम मोट सोंट हेतै दगुन जोश सं काम पर जेतै तों त' आव बस बनलैं भूत नहिं रहतौ तोहर धिया आ ने रहतौ तोहर पूत ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,16-03-2020

गीत मैं कैसे गाऊं कोकिल

(गीत, एक मात्र की छूट ली गयी है, गायन की दृष्टि से) गीत मैं  कैसे  गाऊं कोकिल, तुम  संग सुर  मिलाऊं रे टूट  चुके  सब  साज  मेरे,  गला  भी  बुझने  आये रे ।                                  गीत मैं कैसे गाऊं कोकिल ! अनिष्ट देखकर दृष्टि गंवायी,कान  भी  बन्द  पड़े हैं रे पाप की चादर  इतनी मैली,  साबुन से  नहिं  धुलता रे !                                                       गीत मैं कैसे गाऊं कोकिल ! तुम खग हो खग की है नगरी, प्रीत की रीत  तुम्हारी रे कू कू करके  गाते जब तुम , खग मृग सबही  नाचे  रे !                                           ...

सूनी पड़ी निगाहें

        सूनी  पड़ी  हैं  गलियां  वीरान पड़े हैं रास्ते हिम्मत नहीं किसी में  पूछें कि किस वास्ते । चली है ऐसी कुल्हाड़ी  पैर  ही  कट  गये हैं देखकर लहू को  बहते  आंसू  निकल  रहे हैं । तूफान आ रहा है  या जा  के  सुला  गया है अव सांस पूछ रही है  मुझे कब सुला  रहा है । सारे शहर  में  पसरा   उजाला है  कि अंधेरा आंखें  पूछ रही  है मुझे दिखता क्यों नहीं है। हैं पक्षी  पेड़ पर  बैठे  गली  में  कुत्ते  सहमे एक  दूसरे  से पूछें  मनुष्य  को क्या हुआ है। डॉ.प्रमोद कुमार पांडिचेरी,22-03-2020

हरि नाम जपियौ

      हरिक नाम जपैत रहू  शिव के नाम  रटू यौ ब्रह्मा के ने दोष दियौन  जन्म  कियै  देलहुं !                                                          हरि नाम जपियौ ! दुर्गा  दुर्गति  हरथिन  सरस्वती जी ज्ञान  देती लक्ष्मी गौरिक शरण मे अहां दिन राति खेलियौ                                                          हरि नाम जपियौ ! गुरूक  चरण  पकरू  अहां मातु पितु पूजू यौ ज्येष्ठ श्रेष्ठ सभक बात मानू भव धार तरियौ                           हरि नाम जपियौ ! शुद्ध भोजन खाकय अहां  निर्मल जल पिबूयौ धूआं  धुकुर करु  नहिं  तब  दीर्घजीवी बनिय...

कुसुमक कांट

            उपवन मे कुसुमक रंग देखि        मोन कनि भंसियाय लागल जखने कनि लग मे गेलियै        कांट सौंसे सन्हियाय लागल डरैत हाथ बढ़ौलियै कनिञें         सौंसे खून टपटपाय लागल भंवरा घेरलक चहुं दिशा सं         सुंघ भोंकि तमसाय लागल कुसुमक उर कठोर देखियौ       शोणित देखि ठिठियाय लागल बिनु पानि के माछ जकां        ब्याकुल मन छटपटाय लागल ऋतु बसंत गदरायल समीर          पाथर मोन पगलाय लागल देखि पराइत रंग उपवन सं        सखी, कुसुम खिखियाय लागल नित्य स्वप्न मे हुनके देखी        दिवश रात्रि नहिं अन्तर बांचल बिझैल डिब्बा मे बन्द प्राणी         आन ठाम लय औनाय लागल । डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,25-03-2020

की हम वैह पुष्प छी

    रंग हमर अछि ओहिना शनगर               लाल गुलाबी बुल्लू पियर उपर अम्बर ओहने विशाल             बुल्लू चद्दरि ओढ़ने निहाल निचा धरती हरियर पसरल          तितलिक पांखि फर फर फर फर भौंरा  गावि रहल अछि गूं गूं             माइल पानि पटाबथि गर गर मालिन हाथक फुलडाली गोल                माला के नहिं कोनो मोल रमणिक गजरा गोल भेल अछि            पूजा पाठ तक बन्न भेल अछि मंदिर क्यो नहिं लय जाइत अछि      की भेलै मनुक्ख के नहिं फुराइत अछि  प्रभु चरण मे अर्पित भय हम                                चरम आनंद पावि लै छलहुं नहिं पुजेगरी आ नहिं प्रेमी               नहिं श्रृंगार मे लागल प्रेयसी    क्यो नहिं  वन मे आवि रहल अछि   ...

परिवार

        एक खढ़ दोसर खढ़ तहि पर सं तेसर खढ़ घाम पसेना तर बतर टप टप टप, टप टप टप हार पांजर हिलै छै नहिं पसेना पोछै छै उड़ उड़ उड़ फुर्र फुर्र फुर्र एकटा घर बनै छै चिड़ी चिड़ा मुस्काइ छै दूटा अंडा गोल गोल चिड़ी चिड़ा के मिठगर बोल आइ जे सुन्दर भोर भेलै चुन चुन चुन अनघोल भेलै आइ अपन परिवार भेलै केहन  दीव संसार लगै चिड़ी के मन अह्लाद भरल चिड़ा के उर अनुराग भरल ! नाचि रहल छै पत्ता पत्ता गाछक त' सब दुख निपत्ता ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,27-03-2020

माधव कोना कठोर

          माधव   अहां  कोना  एहन  कठोर अहां  शीतल   श्रीखंड  छी  माधव हृदय  माखन  सन  उज्जर  कोमल आरक्त नयन अछि कमल द्वय तोर                  माधव अहां कोना एहन कठोर ! साउन   बितल  शरदो  चलि  गेल भरल   चातक  नयन  अछि  नोर ताम   झाम  संग   बसंत  अएला नाचैत  अछि  हमरो  मन  मे मोर                माधव अहां कोना एहन कठोर ! अछि  अहांक  कुंतल उमरल घुमरल भान  होइछ   सद्यहिं  बादल  जोर सुमन  सौरभि  सं  भरल पूरल अछि सुषमा  सं  आंचर  भरि  दिय'  मोर                   माधव अहां कोना एहन कठोर ! मज्जर  गमकै   छै  कोइली  कुहुकै सुर   पसरल   छै...

मैं तो चंदा मामा हूं

          मैं  तो  चंदा  मामा  हूं,  ठंढ़ा  ठंढ़ा  रहता  हूं सो जाय मुन्ना प्यारा और सो जाय मुन्नी प्यारी घूम  घूम नाच  नाचकर, लोरी  गाता  फिरता हूं                            मैं  तो चंदा मामा हू । खिड़की के जाली से होकर मुन्नी को सहलाता हूं रोशनदान  से कूद  कूदकर  मुन्ने को लुभाता हूं मम्मी भी  सो जाती  जब ,मैं तो गाता रहता हूं                              मैं  तो चंदा मामा हूं। सूरज जब  सोने जाता है मैं  ड्युटी लग जाता हूँ    रात को सब सो जाते हैं मैं तो जगा ही रहता  हूं दादी  मां   खर्राटे  भरती   दादाजी  उगताते  हैं                               मैं तो चंदा मामा हूं। बच...

काकी गीत

(मित्र लोकनि, हम एकटा गीत लिखवाक प्रयास कैलहुं अछि। अहि गीत मे ओहि तरहक ब्यक्तिक मनोभाव परिलक्षित कैल गेलै, जे वर्षों पहिने जीवन यापनक क्रम मे गाम छोरि परदेशी भ’ गेलाह। बाल -बच्चा सभ पढ़ि -लिखि, विवाह दान कय आन आन ठाम जिवन जी रहल छथि। आव ई दुनु गोटे बूढ़ आ असमर्थ भ’ गेल छथि। प्रतीकक रुप मे कौआ के अपन मोनक उद्गार सुनवैत अत्यंत बृद्ध अपन काकी के संदेश पठवै छथिन) काकी भेजलहुं हैं कौआ के गाम यै                                 कनि बथुआ पठा देब पठादेव काकी सेरसो के साग यै                                 कनि पटुआ पठा देब । तिलकोरक पात भेजु, भेजू एरकंचन -2             भेज दिय’ मुंगरी माछ यै                                कनि घौका पठा देब। कत्तेक भार आयल कनिञां के गाम सं -2 भेज दिय’ पान ओ मखान यै 2     ...