हेरायल जीवन (मैथिली कविता)

हेरायल जीवन

पायलक रुण -झुन
कनबालिक चमक 
कोयलिक पंचम
वीणाक तार
पाइनक कल कल 
हवाक गुदगुदी
कियै दुखाइयै

तिमनक स्वाद
माछक झोर आ'
फुलबारिक फूल सं
कियै मुंह दुसाइयै

रुपैयाक ढ़ेर
आ थुलथुल देह
हवा मे विचरण
कियै छुछुआवैया

पहिल बेर आई
हृदय सं कान मे
ईयर फोन जोड़ा गेल 
सभटा कियै भिन्न भिन्न 
आव सुनाइयै

दिमागक सोचलाहा 
बेकार बुझाइयै
दिलक जे सुनने रहितहुं 
गामें मे रहितहुं

शहरी जीवन
मशीन भ’ गेल
से आब बुझाइयै। 

वेशी की लिखू
किछ ने सोचाइयै
माथ झनझनाइया'
मेलाक बिच छी
हेरायल सन बुझाइयै। 

प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरु लाल दास “
पांडिचेरी 08-02-2019

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