मैं और मेरी सांसें (हिन्दी कविता)
मैं और मेरी सांसें
क्यों धमकाती हैं
हर सुबह, हर शाम
हर घड़ी , मुझे
मेरी ही सांसें!
जहां कहीं कुछ हांका नहीं
इधर उधर कुछ झांका नहीं
बस चढ़ आती हैं सांसें
जोर जोर से चलने लगती हैं
धड़कने बढ़ा देती हैं
छोर कर चल दूंगी तुम्हें
धमका देती हैं सांसें!
उस दिन
एक बकड़ी का बच्चा
कार के नीचे आ गया
में में चिल्लाया
सड़क किनारे खड़ा मैं
बस यूं ही देखता रहा
सांसों को मौका मिला
बड़ी जोर का धमका गया
अगले ही दिन
चौराहे पर खड़ा था
चाय की चुस्की ले रहा था
एक लफंगा
एक युवती का दुपट्टा उड़ा गया
मैं अवाक, पर कुछ कर न सका
इस वार मेरी सांसों ने
ऐसे जोर से धमकाया
धड़कन बेहिसाब
पेशानी पर पसीना छाया
धड़कन बंद
सांसें गुल
बहुत से लोगों की पैरवी पर
फिर वापस आया
अब बाहर नहीं निकलता हूं
सांसें गंवाने का रिस्क नहीं लेता हूँ।
प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 14-03-2019
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