नाथ, अनाथ (मैथिली कविता)

नाथ, अनाथ !

हम दिनकर, दिवाकर, भास्कर
हम दीनानाथ, अनाथ!
दौड़ते रहै छी
भाइगते रहै छी,तैं 
हम गोल छी, लाल छी
छी धधकैत लहकैत ज्वाला 
भोरे जगबै छियै 
बात कथा सुनै छी। 
नहिं बरसलै बादल
नाम लागल हमर
सभटा जरा देलकै! 
कनियां काकी
पारलन्हि अदौरी
बदरी लाइद देलकै 
बदनाम भेलहुं हम 
रौदे नै उगलै !
जारक मास
कुहेश लदलकै 
जारे सभ ठिठुरै
बदनामी हमरे कपार
दिनकरो बुढ़ा गेलै
कत्ते गरम छलै
आव ठंढ़ा गेलै!
ऋतु बदललै 
गृष्म पसैर गेलै
घाम चूलै भोरे भोर
लोक सभ चिचियैल 
केहन निर्दयी छै ई सुरुजो 
भोरे जड़ब’ लगै छै। 
जेठक दुपहरिया 
मुर्छित भ’ खसलै बटोही
हे! दिनकर कियै मारै छहक!
खापरि फुटल हमरे कपार! 
सभ सं दुलारी धिया हमर 
नाम देलियै पृथ्वी !
नाइत,नातिन त’ कोइसते छल
आव ईहो कहैया’ 
जहिया सं जनम भेल 
नचेनहें छी 
आव की करू! 
नाथ हम! 
अनाथ छी! 

प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरु लाल दास “
पांडिचेरी, 16-02-2019

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