फेर अएलै होली (मैथिली कविता)
फेर अएलै होली
फेर सं होली आवि गेलै पियरगर
गोपी सभक मोन छै उमंग स हरियर
टोला ओ पड़ोसा मे भीर भेलै भारी
गोपी सभ लागथि बड़ सुन्नर पियारी !
गोपी सभक तैयारी छैन बड़ भारी
रंग अवीर गुलाल छथि सब रखने
थाल मे गोंतथिन,छथिन्ह ओ सोचने
अहि बेर राधा बनि जेती बेचारी !
कान्हा त अपने बड़ चतुर सियान छथि
राधाक पलंग तर जाक’ नुकायल छथि
राधाक घर भरल छनि रंग कचनारी
राधा त आई बड़ तृप्त छैथ नारी!
खीर पुरी पुआ और छै तरकारी
छप्पन प्रकार सं, भरल छैक थारी
राधा नहिं जनली नटवर के लीला
क्षण मे बिगारलथि राधाक खेला!
राधा गेली जुड़ा मे लगव’ वेणी
एमहर जे माधव झट दनी पड़ेलनि
गोपीक संग जा फगुआ खेलेला
थाल गुलाल रंग अवीरो लेपवेला !
भूत बनल कान्हा राधा घर एलखिन
कुपित भ’ राधा द्वार नहिं खोललखिन
द्वार पर ठाढ़ कान्हा बड्ड खेखनला
क्रोध त्यागि राधा मुदित मन भेलखिन। !
प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 18-03-2019
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