ईमान बेचता हूं (हिन्दी व्यंग्य कविता)

ईमान बेचता हूं

हां, मैं ईमान बेचता हूं
रोज ही ग्राहक आते  हैं
कोई मोटा, कोई पतला
कोई बड़ा रसूख वाला
     
      मैं कितना ईमानदार
      किसी को नहीं लौटाता
      जो जितना देता है
      ले लेता हूं
      वादा कर लेता हूं
      ईमान बेचता हूं।

उसबार तो हद ही कर दी
बहुत बड़ा रकम पाया
पूरे परिवार का मिलेगा
भरोसा दिलाया
दिया किसी और को
क्या करूं
गर्व करता हूं फिर भी
वह देश बेचता है
मैं ईमान बेचता हूं।

      पिछले बार उसने कहा
      पुरुषोत्तम को 
      आराम दिलाऊंगा
      तंबू से निकाल कर
      महल में रखुंगा
      पहली बार ईमान न बेचा
     
लेकिन इस बार
वादा करता हूं
बड़ा बेईमान बनुंगा
सभी सीमा लांघकर
ईमान बेचुंगा।

प्रमोद कुमार "नेहरू"
पांडिचेरी
दि. 15-12-2018
सायं-7-05 बजे

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