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Showing posts from April, 2020

कोना हम मृत्यु पर नाचू

    छाती फाटल हमर ओहि दिन           निर्भयाक जहि दिन प्राण गलै। चारि टा जीव टंगा गेल भोरे           ओकरो प्राणक अवसान भेलै। एकटा टांग टुटल ओहि दिन            दोसरो आइ टूटिये गेल भाई। हम संसारिक,  नहिं छी मसानी            नाचू कोना क्यो दिय' बताय। करोड़ों असुर देवता सब मारलथि           रावण संग लाखों मारलथि राम। फेर करोड़ों मरला महाभारत मे          तैयो नहिं बदलल अछि परिणाम। मनुख मात्र एक जीव बनल अछि          सोच विचार के छोरि चुकल अछि। भाय बहिन नहिं सूझै छै ककरो           मात्र स्त्री पुरुष मे बंटा गेल अछि। कलयुग जेना चोटी चढ़ल अछि             प्रलय निकट  देखा रहल अछि। हमत' देख रहल छी भाई सब            सबहक गरदनि टंगा रहल अछि। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,20-03-2020

आशा के दीप

हमने आशा के दीप जलाये तुम्हें अंधेरा पसंद है तो हम क्या करें हमने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तुम्हें दुश्मनी पसंद है तो हम क्या करें हमने तुम्हें पतवार थमाया तुम्हें डूबना पसंद है तो हम क्या करें हमने रास्ते दिखाये मंजिल की तुम्हें भटकना पसंद है तो हम क्या करें पूरा देश एक साथ है तुम्हें तन्हा पसंद है तो हम क्या करें जीते हैं, जीतेंगे देखना तुम तुम्हें हारना पसंद है तो हम क्या करें हम दौड़ेंगे, उर्जा भरी टांगों में तुम्हें लड़खड़ाना पसंद है तो हम क्या करें! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,05-04-2020.9.40pm

मन की बात

दिल ने कहा मन से मैं ठीक हूं जिस घर में हूं वहीं ठीक हूं बाहर नहीं जाऊंगा हवा गंदी है बैठ जाऊंगा तुझे जाना है तो जा और मन चल पड़ा दूसरा घर सुरक्षित कर लूं कौन जाने ! बसंत आकर जल्दी चला गया था एक बूढ़ा पेड़ आश लिये अभी भी खड़ा था अव क्यों खड़ा है गिरने से पहले दूसरा घर देख ले मेरे साथ हो ले पेड़ ने कहा मैं ने जड़ को कस कर पकड़ा है पपड़ी के नीचे जमीन अभी भी गीली है कोपलें छूटेंगी कुछ देरी हुई है पर उदास नहीं हूं काश ! मैं भी तेरे जैसा दृढ़ होता मन वापस चल पड़ा ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,11.04-2020

अम्बर को छूऊं

                बहुत बड़ा तुम करना प्रभु मुझको हाथ बढ़ा कर अम्बर छूऊं ज्ञान की वर्षा करूं वहां से सम्पूर्ण धरा को सिंचित कर दूं स्निग्ध धरा पर कोपल नव फूटें हरितिमा की चादर फैले खग मृग खेलें भय विहीन हो बहे प्रेम की सरिता कल कल मानवता की झरना झर झर पर एक उपकार करना प्रभु मेरे इतना भी बड़ा न बनाना मुझको चौराहे पर मूर्ति बनकर कौवे बीट करें सिर बैठे नहीं बनाना डाक टिकट तुम रोज रोज ठप्पा खा खा कर विकृत मुंह ले बाहर निकलूं इतनी ही दया करना प्रभु मुझपर पंक्तियों में नाम सजाना पुस्तक बन जायें चिर गृह मेरा पाठक का मुख देखूं और मुस्काउं ! डॉ.प्रमोद कुमार पांडिचेरी,18-04-2020

करोनाक भूत आ भविष्य

रे कोरोना खट्टा खट्टा           भ'  गेलैं  तों  बड़ तीत बाप चिनियां झुट्ठा तोहर           बड़ नाटक करै छौ नीच।   कत' रहै छैं क्यो नहिं जानौ                        नहिं बुझले छै तोहर रूप   पेट कत्तेकटा अनने छैं तों                     कहिया मिटतौ तोहर भूख। जे जनमेलकौ ओकरे खो          जे  पठौलकहु  ओत्तहि जो भारत के तों नहिं जानै दुष्टा          क्षण मे करतहु तोहर भुर्ता । एक्कहि बूंद वैज्ञानिक अनतहु                    तोहर लेश नहिं रहतहु कत्तहु बापे  पूते  मरि  जैबैं  तों                            भूत प्रेत मे जा बैसबैं तों। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,21-04-2020

अक्षर बन आऊं धरती पर

            अक्षर  बनकर  आऊं  धरती  पर           शब्द  बनूं  और  अर्थ  धरूं फिर पन्ना  दर   पन्ना  बढ़ता  जाऊं          बन पुस्तक,  और फिर  लग जाऊं । हर  अक्षर  एक  दीप  बने  प्रभु !         जैसे   नभ  में  तारों  की लड़ियां लड़ी  दर  लड़ी  घरों  में टंग कर          घनघोर  तिमिर  को  दूर  भगाऊं । कण  कण  बादल  जल  पीता  है          फिर  कर  प्रयत्न  अम्बर चढ़ता है जहां  भी  हरियाली   जलता  देखे          बूंद   बूंद  फिर  बरस   जाता  है । लेती   अंगराई   जीवन  फिर  से          रिक्त...

खुराक

        हाथी जैसा डील डौल है ऊंटों जैसी चाल फटे बांस सी बोली मेरी भालू जैसे बाल। डायटिंग पर हूं मैं आजकल खुराक कर दिया आधा दर्जन भर केला ,किलो भर सेव उतना ही अंडा, लीटर भर दूध रोज सुबह लेता हूँ ठूस। लंच में लेता रोटी भात चिकेन फ्राई और मछली साथ दाल मक्खनी, गोभी फ्राई डेसर्ट केलिए देखूं राह बस इतनी सी  मेरी खुराक। डिनर में  लेता रोटी दस बड़ा कटोरा अरहर दाल बहने देता घी की धार किलो भर शब्जी उतना ही दूध जा पकरता अपनी खाट बस इतनी सी मेरी खुराक। प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 02-04-2019

ऐ हवा हमें बता दे

        ऐ हवा हमें बता दे कहां ले चली उड़ा के धरती पे मैं  खड़ा था गिरने का डर भुला के               ऐ हवा हमें बता दे ………..! मैं  विचर रहा गगन में अद्भुत समा बंधी है बादल हैं साथ मेरे नभचर गले लगाये              ऐ हवा हमें बता दे........... ! सितारों की लम्बी बस्ती हैं चांद की अदाएँ क्षितिज भी जैसे मुझसे मिलने को दौड़े आए                ऐ हवा हमें बता दे………..! ऊँचाइयों पे आकर मुझे डर सा लग रहा है गिर गया  मैं कभी तो मुझे कौन फिर उठाये              ऐ हवा हमें बता दे......... ! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी, 13-04-2019

नदी हूं, बहती रहुंगी

उसने मुझे नदी बनाया सदा बहते रहना मंत्र सिखाया तुम प्राणियों के प्राण हो बाधाओं से मत घबराना कंकड़ पत्थर जो भी आवे सभी को मित्र बनाना फिर भी यदि कोइ रोके राह तुम्हारा बगल से राह बनाना तेरा आदि पवित्र अंत भी पवित्र फिर क्यों और कैसा घबराना तुम मैल बहाओगी, धोओगी आंचल तो मैला होगा हृदय की धारा स्वक्ष तुम्हारी मन न मैला होगा तेरे सृजन का पालन मैं तो करती हूं, करती रहुंगी सभ्यता का भार उठायी है तो पीड़ा चाहे जितना भी हो धार न रुकने दुंगी प्रवाह बनी रहुंगी। प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी, 06-03-2019

हमर सुन्दर कनिञां

              हे यै कनिञां हमर सुन्नर अहांक साड़ी गोर अहां रत रत केश बड़ कारी            हे यै कनिञां.......! आंखि अछि पैघ पैघ ठोर लेने लाली ग्रिवा अछि घिचल घिचल नाक अछि आरी             हे यै कनिञां...... ! रुन-झुन पायल अहांक चमकै कन वाली तन भिजत मन भिजत भिजत अंगिया कारी            हे यै कनिञां......! हंस सन चालि अहां के एखनो युवती नारी रंग बोरव अविर लेपव तोरब हम खुमारी           हे यै कनिञां........! प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 17-03-2019

कौन गाम कौन ठान

कच्ची पक्की सड़क धूरा गर्दा सं आच्छादित पता नहिं की फुड़ैल पड़ोसक गाम मे घुसि गेलहुं क्यो नहिं तकलक गोटैके बूढ़ पुरान ओहो नहिं देलनि ध्यान बढ़ल जाइछी एतय त’ एकटा पोखरि रहै ! ओकर बगले मे ब्रह्मक स्थान ! माय’ डेंग पकड़ि क’ अनने रहै कतेको बेर दशको बितलै मुदा स्मृति शेष अछि गाम सं निकलितहि प्रश्नक झड़ी लागि जाई बौवा !की नाम, कौन गाम, कौन ठाम ओकर श्चात पांच पिढ़िक परिचय ! खट खट सुना दैथि मोन त’ खौंझाय मुदा माय’ चुप करा दियै’ आई की भेलै! ब्रह्मक स्थान कतय छै! रस्ता त’ वैह! कनि काल ठक वक जकां ठाढ़ रहलहुं हे! ब्रह्म बाबा क्षमा करब ! माय गेल! कि अहूं चलि गेलहुं! अहि पापी के यैह लिखल छल! पश्चाताप सं मोन खिन्न छल तखने एगो बृद्ध अभरलाह की नाम! कोन गाम! कोन ठाम! जी जुरा गेल! जेना साक्षात ब्रह्मे बाबा रहल होथि हमरा ब्रह्म स्थान देखा क’ कहलथि आव कहां क्यो अवै छै एम्हर आत्मा तृप्त भेल! ब्रह्म स्थान दिश बढ़लहुं पाछू तकलहुं त’ क्यो नहिं ओ बुढ़ा कहां गेलाह! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 01-06-2019

विरह गीत

                                    मोर पिया परदेश बसै छथि ,हम विरहन बड़ ब्याकुल रे तों जो  कागा  देश पिया के,  सात  समुन्दर  पार  रे।             तों जो कागा जो देश पिया के, हम विरहन बड़.ब्याकुल रे........... ! देख सिनुरिया  आम देबौ हम ,देबौ  तोरा बम्बई रे चांगुर मे हम मोती बन्हवौ ,कांचन सं चोंच मढ़वौ रे                                                            तों जो कागा देश पिया के ..............! गौर वर्ण, मुख चान पिया के,सौष्टव अति मन भावन रे केशक शोभा की हम कहियौ,उमड़ि -घुमड़ि घन बादल रे                                                   ...

विरह गीत

                                    मोर पिया परदेश बसै छथि ,हम विरहन बड़ ब्याकुल रे तों  जो  कागा   देश  पिया के   सात  समुन्दर   पार   रे।             तों जो कागा जो देश पिया के, हम विरहन बड़.ब्याकुल रे........... ! देख सिनुरिया  आम देबौ हम ,देबौ  तोरा  बम्बई रे चांगुर मे हम मोती बन्हवौ ,कांचन सं चोंच मढ़वौ रे                                                            तों जो कागा देश पिया के ..............! गौर वर्ण, मुख चान पिया के,सौष्टव अति मन भावन रे केशक शोभा की हम कहियौ,उमड़ि -घुमड़ि घन बादल रे                                       ...

पगली के बच्चा

                आइयो त' ओहिना खेनरी ओढ़ि बैसल छलै टिशन के कोना मे मोने मोन किछ बुदबुदाइत पगली छै! तखने ओकरा अभरलै एकटा बालक ओकरे सं सैट क' फोकरि फोकरि कनै छै बगले मे अईंठ ठोंगाक ढ़ेर दू दाना मुँह मे देलकै बच्चा और फोकरै छै पागल छै,की जनतै ई कत्त सं अएलै मुदा ओकर आंखि भिजलै पिपनी पर सं दू बूंद टपकलै उठेलकै छाती सं सटेलकै आव जत्त जाई छै सटौनहें रहै छै जीवै छै ऊ बच्चा पता नहिं की पीवै छै। ऊ पगली डबल पगली कहाइ छै!! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास पांडिचेरी, 06-04-2019.

मैं और मेरी सांसें मैं और मेरी सांसें क्यों धमकाती हैं हर सुबह, हर शाम हर घड़ी , मुझे मेरी ही सांसें! जहां कहीं कुछ हांका नहीं इधर उधर कुछ झांका नहीं बस चढ़ आती हैं सांसें जोर जोर से चलने लगती हैं धड़कने बढ़ा देती हैं छोर कर चल दूंगी तुम्हें धमका देती हैं सांसें! उस दिन एक बकड़ी का बच्चा कार के नीचे आ गया में में चिल्लाया सड़क किनारे खड़ा मैं बस यूं ही देखता रहा सांसों को मौका मिला बड़ी जोर का धमका गया अगले ही दिन चौराहे पर खड़ा था चाय की चुस्की ले रहा था एक लफंगा एक युवती का दुपट्टा उड़ा गया मैं अवाक, पर कुछ कर न सका इस वार मेरी सांसों ने ऐसे जोर से धमकाया धड़कन बेहिसाब पेशानी पर पसीना छाया धड़कन बंद सांसें गुल बहुत से लोगों की पैरवी पर फिर वापस आया अब बाहर नहीं निकलता हूं सांसें गंवाने का रिस्क नहीं लेता हूँ। प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 14-03-2019

                          क्यों धमकाती हैं हर सुबह, हर शाम हर घड़ी , मुझे मेरी ही सांसें! जहां कहीं कुछ हांका नहीं इधर उधर कुछ झांका नहीं बस चढ़ आती हैं सांसें जोर जोर से चलने लगती हैं धड़कने बढ़ा देती हैं छोर कर चल दूंगी तुम्हें धमका देती हैं सांसें! उस दिन एक बकड़ी का बच्चा कार के नीचे आ गया में में चिल्लाया सड़क किनारे खड़ा मैं बस यूं ही देखता रहा सांसों को मौका मिला बड़ी जोर का धमका गया अगले ही दिन चौराहे पर खड़ा था चाय की चुस्की ले रहा था एक लफंगा एक युवती का दुपट्टा उड़ा गया मैं अवाक, पर कुछ कर न सका इस वार मेरी सांसों ने ऐसे जोर से धमकाया धड़कन बेहिसाब पेशानी पर पसीना छाया धड़कन बंद सांसें गुल बहुत से लोगों की पैरवी पर फिर वापस आया अब बाहर नहीं निकलता हूं सांसें गंवाने का रिस्क नहीं लेता हूँ। प्रमोद कुमार उर्फ” नेहरू लाल दास “ पांडिचेरी, 14-03-2019