आन्हर (मैथिली लघु कथा)

आन्हर
 
                   (एकटा लघु कथा)

चूं--चीं--धक, हल्का झटकाक संग गंगासागर एक्सप्रेस सियालदह स्टेशन पर रूकि गेल।सभ उतरनिहार। बड़ पैघ आपा-धापी।कुली सबक दौरम- दौर। अपार जनसमूह। जत' देखूं, मुंडक-मुंड।एको डेग चलब कठिन!कनियां के कहलियनि," सुखदा! कनि रूकि जाऊ।भीड़  कम हुअ' दियौ। नहिं त' कत्त' क' धकेलत, खसब आ' हाथ पैर टूटत से नहिं जानि। दुनू गोटे कात भ' क' ठाढ़ भ' गेलहुं।
भीड़ छंटलै। " सुखदा "आव चलू" ।हम दुनू हाथे दूटा बैग, पहिया वाला, गुड़कबैत चललहुं।अनेकों बैग, अनगिनत हाथ, किन्तु आवाज एक्के-" घर्र घर्र, चर्र चर्र, घिस, घिस, जेना लाइन सं अनेकों कटही गाड़ी चैल जा रहल हो।सभ यात्रि एके दिशा मे आगू बढ़ैत। मुदा गंतब्य भिन्न। हमरो सभ के सांझ में 5.30बजे फ्लाइट छल। मद्रास के लेल।सोचलहुं," सियालदह टीशन पर उच्च क्लास प्रतिक्षालय में साफ-सफाई नीक छै। एयर कंडीशन सेहो छै।ओतहि जा क' कनि फ्रेश होयब, जलखै करब,सामान सभ अमानती घर में राखि, दू- चारि घंटा घुमव-फिरव,। तखन प्री पेड टैक्सी ल' एयरपोर्ट चलि जायब।घूमि क' पाछां देखलहुं त "सुखदा" पछुआ गेल रहथि।कनि रुकलहुं। ओ आबि गेलीह, कनि खिन्न भ' क' कहलियनि," कनि तेज चलब से नहिं।" ओ बजलिह," अहां के हरदम हरबड़िये रहैया।" फ्लाइट सांझ में छै। अपसियांत कियै होइ छी। आखिर वेटिंग रूम में पहुंचलहुं।पांचेक गोटे पहिने सं बैसल छलाह।स्त्रि- पुरुष सभ।" सुखदा", कनि तौलिया, साबुन निकालू। हम बाथ रूम सं भेने अबै छी, हम कहलियनि। हे! सुनु ने! कनि 
शेविंग सेट सेहो निकालू। दाढ़ियो बनाइये ली। 

आव खिझै के पार सुखदा क' रहनि, " खोंखिया क' बजली," काल्हि दुपहरिये में त' दाढ़ी बनौने रही।" के बैसल अछि देखैलै? आव उमर भेल।एक दिन नहिंयें बनैब त' की हैत।हम मुस्केलहुं, कहलियन्हि," अहां लै बूढ़- बकलेल! कनि फ्री क' क देखियौ ने। एखनो लाइन लागि जैत।" जाऊ-जाऊ, पूछै कोई ने आ कहावी कानूनगोइ।" हमर मुस्कुराहट कनि आरो बढ़ि गेल।

           बाथ रूम सं आवि, कपड़ा बदललहुं।एकदम फ्रेश। कहलियनि," सुखदा... यै सुखदा--- "आं-- आंईं, " कनि हड़बड़ैलथि,। हम कहलियनि," किमहर तकै छी?" देखियौ ने , " आव हम केहेन लगै छी, एकदम राजकुमार"! ओ घुरकलीह, " धुर जो आप मियां मिट्ठू!" ओ खिझ क' बजलीह। अच्छा ठीक। आव शांत होउ।  आगां के सोचूं।अहूं फ्रेश भ' जाउ, तखनि नाश्ता- पानी करब।
         
            आबि गेलहुं, "आऊ, आऊ" नाश्ता निकालू। सुखदा बैग खोललनि।प्लास्टिक के झोड़ा में स' कागजक प्लेट निकालि हमरा हाथ में धरौलनि, संगहिं कहली, " रौतके पूड़ी- भुजिया? जाउ ने । लगे- पास सं टटका किछु ल' आऊ। कहीं ई खराब ने भ' गेल होइ।अहांके गैस्टिक अछि, खराबी करत। हम कहलियनि," अहां बिना- बुझने- गमने बजै के आदत छोड़ूं। " दूध में आंटा सानि, घी में पूड़ी छानल अछि।" भुजियो मे प्याज नहिं देल छै" निके हेतै। ओतेक प्रेम सं बच्चाभाई देने छथि। ओहिना कोना फेंक दियौ।" लाउ-लाउ, देखियौ, केहेन गमकै छै! एकदम फ्रेश! आंईं! आमक अंचारो छै! त' राइत कियै ने देलहुं? ओ बजलिह," देखबे ने कैलियैह। हम बजलहुं, " अहूं जे छी ने! आंईंख मुनि क' काज करै के आदत अहां के नहिं गेल। " हं...हं... हम त' आन्हरे छी!" अहां कहियो हमरा निक कहब! मामला गम्भीर होईत देखि, हम मनुहार कैलहुं," से सुखदे! अहां तक सुखदा मणि छी! नईं तमसाउ! जनै नै छियै हमर नेचर! बेकारे किछ बाजि दै छियै! अहूं खाउ ने। हुनकर होंठ पर मुस्कान छायल। भीतर सं मोम छथि। आइतक कहियो रुसलथि नहिं।  हम पूड़ी, भुजिया आ' अंचारक मजा लेव लगलहुं।ओहो खाय लगली।हम सभ गप्पो करैत जाइ छलहुं।तखने ओ हमरा केहुनियां क' कान में फुसफुसेलथि," ओई आदमी के देखै छियै,' "ऊ" चश्मा वला!" सामने के बेंच पर बैसल एक ब्यक्ति के दिश इंगित क' क' बजलिह।" हं से की?" 
देखियौ ने तखैन सं अपने सभ दिस ताकि रहल अछि। हम देखलहुं ! एकटा ब्यक्ति, नीक कपड़ा- लत्ता, जुत्ता- मौजा,यैह करीब ४०-४५ के उमर। निक ब्यक्तित्व!  हम कहलियनि," ऊ, अहां के ओहिना संदेह होईया। हंसी कैलियनि," अहां के स्नौ पाउडर लगबैत देखि ....! जाऊ...! अहां के सभखन मजाके सुझैया! देखियौ ने अखनो एम्हरे देखि रहल अछि। बात सत्ते। आव हमरो किछु शंका भेल।ई एना कियै तकै या? कोनों चोर- उचक्का त' नहिं? आई- काल्हि ककरा पर विश्वास करू। चोर-चोर चुहाड़, और बेसी स्मार्ट । प्लेट कनियां के पकड़ेलहुं, जा क' कहलियै, " भाई साहेब! की बात?" ओ चौंकल! प्रश्न कैलक," से की"?   हम कहलियै," अहां एना कियै हमरे सभ दिश लगातार ताइक रहल छी?" अहां के कोनों घर - वेद नहिं? अहूं के माय- बहिन त' जरूरे हेती। एहन अशिष्ट नहिं देखने रही! हम अनवरत बजने जा रहल छलहुं। औरों लोक सभ जमा भ' गेल। सभ , सभ तरहक गप्प। एतबे काल में एक संभ्रांत सनक महिला अएलीह।अबितहि पूछ' लगलीह, हे हे की बात? अहां सभ हमर पति के कियै एना गोलियौने छी? 
तब हम कहलियनि," अहा... त' ई अहांक पति छथि?  देखियौन्ह हिनकर क्रिया-कलाप! ओ स्त्री तमसा क' बि
बजली, " की कैलैथ अछि हमर पति?  तखन हम कहलियनि, " देखू! लगभग आधा घंटा सं ई लगातार हमरे सभ के टुकुर-टुकुर ताकि रहल छथि। असभ्यताक सीमा लांघि गेलाह। आव ओ स्त्री हमरा डंटलक," असभ्य हमर पति की अहां? 
देखै नहिं छियै ओ नेत्रहीन छथि।जिम्हरे मुंह घुमि गेल , तिम्हरे तकैत रहैत छैथ।
हम त' झमारि क' खसलहुं! हे देव! लागल जेना केओ जमीन पर पटैक देने हुवै।ग्लानि ए्वं पश्याताप सं जड़ै लगलहुं। वार- वार क्षमा मंगलियनि। तखने सं दूं टा शब्द  मोन मे करिया बादल जकां घुमरि रहल अछि, आ बिजलौका जकां चमैक- चमैक क' कहि रहल अछि-- " आन्हर के? हम की ओ......?

प्रमोद कुमार "नेहरू"
पांडिचेरी
दि. 08-12-2018
सायं 8.15
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