बड़ नीक रसगुल्ला मिठाई (मित्र दिवश पर मित्र सब करें हसगुल्ला भेंट) मैथिली कविता

बड्ड नीक रसगुल्ला तों

बड्ड नीक रसगुल्ला तों
        अनमन जेना बौगला तों
पाछां जे ठाढ़ तोहर छौ
         बड्ड दीब पेनतोआ छौ।
 
 ईमरती जिलेबी छै रसदार
        मखमल  जकां  मोती चूर
विना ब्रेक के  आवै जाइजो
        मुंह सं  आव खसैया लाड़।

मोन मे बसल रसमलाई
         होइत अछि जे खूबे खाइ
वाट  तकैया  चन्द्रकला 
         दोड़ै छी जे परा ने जाय ।

घेबर के त' बात  ने पुछू
         खाइत रहू आ घी टपकैत
नहू नहू घुलि जैत बतासा
          तुरत्ते मुंह  में जा बिलैत ।

काजुक  बर्फी  आ श्रीखण्ड
        मोहन भोग गाजरक हलुआ
चूरमा मोरब्बा सोन पापड़ी
           करैत  रहैया  हमरा तंग।

हौ  पेड़ा  तों  नहिं  नुकाह
         तोरा संग  बड्ड जुड़ल याद
चारि आना  मे  एकटा पेड़ा
          मोन तृप्त आ खुश दिमाग।

कला  कंद  नारिकेलक  बर्फी
        खस्ता खोआक पिरुकिया नीक
मिल्क केक आ उजरा चमचम
        तहि पर सं फेर कुल्फी फिरनी।

नहिं बिसरी शकर पारा मिठाई
         खाइत  खाइत  पण्डौल  जाइ
भोज भात मे  गाजा बालुशाही
         सबहक  राजा  खाजा  मिठाई।

मुंह मे मोम सन संदेश घुलैया
         दौड़क’ फिरनी राजभोग अवैया
नहिं अधलाह अछि मैसूरो पाक
         घरक  बुनियों  के  बड़  धाख।

आइ मित्र दिवश के हमर भेंट
         नहिं  सोचू  आ   करू  लेट
जे  जिनका  रुचि  मे आवय
           खा   लिय'  आइ  भरि  पेट।

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,30-7-2020

Comments