हत प्रभ (मैथिली कविता)

हतप्रभ

गाल पर हाथ
कपार पर चिंताक लकीर
आंईखो डबडबायल
घोर निराशा आ' पश्याताप
की सोचलहुं
की भ' गेल
बच्चे रही
बियाह भ' गेल
बच्चा सभ नहिं जिबैत रहैय
साउस रहथि, 
मायक दोसर रुप
बड्ड मानथि
दैवक माया, मलेरिया खा गेलनि!
आव नितांत एसगर!
लोक सभ कहलकै हुनका
दोसर बियाह क' लिय'
मुदा नहिं
विद्वान रहथि
अत्यंत बिचारशील
हमरे मे अपन सुख देखलनि
हे दिनकर! हे दीनानाथ!! 
कोख सजाउ!
कोर भरू! हहाकार! चित्कार! 
गुंजा दिय आंगण किलकारी सं
'अरग' चढ़ैब,
'एकादशी' करब
कथा सुनब! 
दिनकर सुनि लेलनि!
आई आंगण भरले-पुरल नहिं                               कोंचल अछि !
बाल- गोपाल सभ सं
आई जे' ऊ' रहितथि
गद-गद होइतथि!
ईश्वरक लीला!

      पाईनभरनी नहिं अएलै आई
      बर्तन- बासन सभ अईंठे
      भनसिया के कहि देलियै
      एगो थाड़ी धो' क'
      ओही मे परोसि दियौ
      बच्चा सभ खा लेतै
      लिय! भ' गेलै बलाय!
      तमाशा शुरु भ' गेल
      " हे तोहर हाथ गन्दा छौ"
      "तोहर पप्पा त' किरानी छथुन्ह"
      " तों त सरकारी ईसकूल मे पढै छैं"
      " तों त' कल्लर जकां खाइछैं"
        बगैरह-बगैरह!
       बच्चा सभ अनघोल मचैलक
       हम कहि देलियै
       कियै एना कुकुर-बिलाड़ि जकां
       कटाझु करै जाइछैं!
       बात केबारिक दौग देने
       अन्त: पुर सभ मे पहुंचलै
       सभ दियादनिक बिच झौहर प्रारंभ
       हम सभ मनुख नहिं
       हमर बच्चा- बुच्ची कुकुर- बिलाड़ि!
       मोटा - सोंटा बन्है लागल!
       बूढ़ी दादी बैसल छथि
       अवाक ! हतप्रभ!!

प्रमोद कुमार "नेहरू"
पांडिचेरी
दि. 16-12-2018
सायं 5-35बजे

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