एक उल्लू! दोसर उल्लू (मैथिली व्यंग कविता)
एक उल्लू! दोसर उल्लू!!
उल्लू के देखलियैया'
नहिं ने!
कोना देखवै
राइत क' निकलै छै
कोटर में ,खोधर में रहै छै
निहायत सुन्दर!
गोल-गोल मुंह
ठाढ़, छोट नाक
पनिगर,चंचल आंइख
पातर- पातर ठोर
ताहु पर
लक्ष्मिक वाहन!
विधिक विधान देखू!
डरल- डरल, सहमल- सहमल!
कखनों कोनों डारि पर, त'
कखनों कोनों मुड़ेड़ पर
बेचारा!
तैयो लोक ओकरा कहै छै
"उल्लू" यानि...
नहिं जानि ,ओकर नाम
उल्लू कियै पड़लै ,वा
अर्थ खराब कियै लगलै
खायर जै दियौ
ऊ त' चिड़ै अछि,
हर्ज नहिं।
आव एमहर ताकू!
देखियौ, एकटा ईहो उल्लुवे अछि
कहबैया' आदमी!
बड़का वंश !
आगा- पाछां, बड़का हजूम
हां ,हां ठिके पकरलहुं
ओहो सभ आदमिये कहबै छै!
पर, मक्कार, फुसि बजवा, देश बेचवा!
अनघोल मचौने अछि
मुदा करिया कोट आ' उजरा पैंट वला
सभ के संरक्षण में रहैया
निश्चिंत, निर्विघ्न!
अपना के
होनहार बुझैया'
शिर्ष पर बैसै के
जोगार लगबैया!
प्रमोद कुमार, उर्फ " नेहरू लाल दास"
पांडिचेरी,
दि. 06-01-2019
12.45PM
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