भूत (मैथिली लघु कथा)

भूत
                                                        (लघु कथा )

दह दह इजोरिया। भादवक राति। यैह करिब डेढ़ -दू बाजल रहल हेतै।आकाश मे कतहु कतहु करिया बादलक धब्बा!
वैह कखनों क’ किछ बूंद टपका दै। नौ बजिया गाड़ी आदतानुसार लेट। हम ईंटर मे पढ़ैत रही। एन. सी. सिक परेडक कारणें अढ़ाई बजे वाली गाड़ी छुइट जाइत छल। सप्ताह मे दू दिन बुद्ध् आ’ शुक्र दिन। मधबन्नी सं राजनगर एके गो बस चलै, बोल बम! 
जेहने नाम, तेहने चरित्र। कखैन, कत्त भंगठि जैत से नहिं जानि। 
कंडक्टर! हे भगवान! एखनों रौइयां ठाढ़ भ’ जाइत अछि। चांडालक दोसरे रुप! किछ भ’ जाय, चमड़ा छिल लेत। भाड़ा लेने छोड़त! दमड़ियो कम नहिं करत। 
अभावक समय रहै। गाड़िक पास बनौने रही तैं ओही सं आवी। चारु दिश एकदम सन्नाटा! जेना सभ के सांप सुंघि लेने होइ। 
झिंगुर पंचम सुर मे गबैत। टिशन सं मछहट्टा तक मात्र दू-चारि टा दोकान आ किछु घर सभ। यत्र तत्र। दूरी यैह करिब दू-तीन सै मिटर। परन्तु मछहट्टा सं दारु भट्ठी तक एकदम सुन्न -मसान। वामा हाथ दिश कमला कात! 
लोकक कहब जे ओत्त दिनों क’ भूत -परेत रहै छै। किताब सभ कें तितै सं बंचब’ लेल अपन पोलिस्टरक बुशर्ट खोलि 
ओही मे लपेट लेलहुं आ’ माथा पर राखि जय हनुमान -जयहनुमान के मोने मोन रट लगौने चलि अबैत रही। धोखो सं पाछा नहिं ताकी। सुनने रहियै जे पाछां तकला स’ भूत पकरि लैत छै। कोनों तरहें बजार तक ऐलहुं। एक दू गोटे एत्त तक आगां -पाछा चलैत रहलाह तैं कोनों विशेष डर नहिं भेल। बजारक बाद फेर फांक! बिच मे मियां टोली। यैह करिब दस -बारह घर। जन-बोइनिहार। सांझ पड़िते जेना घोड़ा बेचि क’ सुइत रहै। मियां टोली आ हमर टोल के बिच एकटा लवका पोखरि। ओहि पोखरिक दक्षिणवरिया महार पर गफूरक घर। छलैथ त’ जुलहा मुदा नामे लै। खेती -पथारी क’ कोनों तरहें जिवन -यापन करथि। हमरो सभक किछु खेत हुनके घरक पछुआर मे रहे। वैह बटाई करैत रहथि। लवका पोखरिक दक्षिण भर,  गफुरक घरक पाछां श्मशान घाट। दाह संस्कार ओत्तहि होई। जनसंख्या कम रहे, तैं आवा जाही सेहो कमे।दिनों क’ लोक ओमहर एसगर नहिं जाई। खैर राम नाम जपैत, हनुमान चलिसा पढ़ैत, हृदयक धडकन के कोनों तरहें सम्हारैत, लवका पोखरि पार क’  अपना टोल मे प्रवेश कैलहुं। आव जेना जान मे जान आएल। ओना एखनो हमर घर लगभग तीन सै मिटर दूर रहै। 
मोन किछु हल्लुक भेल त’ कल्हुका क्लास सभक बिषय में सोच’ लगलहुं। पहिल घंटी मे अंग्रेजी…ऊंह! गोपाल बाबु! बड़ निक प्रोफेसर! लेकिन पान खा’क’  पढ़बथिन से पहिल बेंच पर बैसै बला के सौंसे मुंह कान, किताब कांपी पर पड़ै। तैं कोइ आगां मे नहिं बैसै। 
मुदा की कारण रहै से पता नहिं, हमरा ओ जबरदस्ती आगुवे मे बैसाबथि ।
तखन नागरिक शास्त्र,अंत  मे अर्थशास्त्र। वाप रे! शशि बाबुक क्लास! मजाल छी जे विना सवक पुरा कैने क्लास मे घूस’ देता। 
चिकनी माइट बला कच्ची सड़क आ ताहि पर सं वर्षा। पिच्छड़े पिच्छड़। सम्हारि सम्हारि क चलैत चलैत गोदिया माय के घर तक पहुंचि गेलहुं। ओत’ सं हमर घर मात्र डेढ़ दू सै मिटर। मगर एकपेरिया। एक त’ पिच्छड़ आ ताहि पर सं बिले बिल। गहुमन सांप हरदम निकलै । लोक सभ कहै जे हमर सभक घर नागक डिह पर छै तैं एते सांप निकलै छै। की करितहुं। हमर कोन सक। नहूं नहूं चलैत गेलहुं। गोदिया माय के घरक बाद परती खेत। आइरक दुनु कात। जैं कनि आगां बढ़लहुं कि दहिना कात, लगभग दू लग्गा हंटि क’  एगो स्त्री, धव धव उज्जर साड़ी पहिरने, माथ साड़ी सं झपने, मुंह घुमा क’ ठाढ़ रहै। हम त’ सन्न! भूतक बिषय मे जे जे सुनने रहियै, सभटा ओहने। पैर त’ जेना लोथ भ’ गेल! हृदय बड़ तेज धड़क’ लागल। घबराहटक कारणें हनुमानो चलिसा पढ़नाइ बन्द भ गेल।। आंईख ओम्हरे टांगल रहै। जेना सुतल मे लोक चलैत अछि, तहिना डेग बढ़बैत रहलहुं। कनि आर आगु बढ़लहुं। एखन धरि किछु नहिं कैलक। भेल जे पाछां स पकड़त। हिम्मत कैलियै तैं सामने सं नहिं पकड़लक। आव पकड़त त’ तव पकड़त। हे भगवान! हे बजरंग बली! बंचा लिय’।धोखो सं पाछा नहिं तकलहुं। एही तरहें कहुना क’ दुरखा तक पहुंचि गेलहुं। कोन्टा पर मां डिबिया बारने, देवाल सं सटि उंघाइत रहे। पैरक आवाज सुनि चौंकल। हम धब्ब द’ बैस गेलहुं। मां पुछलक, “की भेलौ? “हम अवाक! जेना सुन्न भ’ गेल रही। पसीने पसीने। कनि कालक बाद सभटा सुनेलियै। मायक ममता जगलै। फरमान सुनेलक।,”एहन पढ़ाई के कोन काज! जखन जाने नहिं बंचतै त ‘की हेतै। काइल्ह सं कालेज नहिं जो। 
खैर चित्त कनि स्थिर भेल।खेलहुं आ दलानक ओसारा पर पटिया बिछा क’ सुइत रहलहुं। 
प्रात भेलै। दिनचर्या सामान्य। अन्तर एतबे जे आइ कालेज नहिं गेलहुं। मोन मे जेना खिन्नता भरल रहै। दस बजैत रहै, बच्चाभाई बजार जाइत रहैथ। हमरो संग क’ लेलथि। जाईत जाईत जखन गोदिया माय के घर लग पहुंचलहुं, तव मैनी (दियादी मे हमर दादी) सड़क पर ठाढ़ भय आर दू तीन महिला स  गप्प करैत छलिह। हमरा देखिते पुछलिह, “ऐं रौ नेहरू! ओत्ते राइत क’ कत्त सं अबै छलही? हम अकचका गेलहुं! पुछलियैन्ह की कहै छी। कखन कत्त देखलहुं हमरा! ऊ बजलिह, “ऐं रौ माथ पर मोटरी लेने खालिये देह तों नहिं चलि जाइत रही। आइरक कात मे त’ हमहीं ने ठाढ़ रहियै! ओम्हर दिश गेल रहियै। तोरा देखिते हम ठाढ़....! 
हमर जेना भक टुटल। पुछलियैन्ह, “त’  आइरक कात मे अहीं ठाढ़ रहियै! 
मैनी बजलिह, “हं हं! कहलियौ ने हमहीं रहियै! बाप रे! लगभग डेढ़ बाजल रहै! एसगरे ओत्ते राइत क’  अवैत डर नहिं लगलहु! हम कहलियैन्ह, “अहां त’ हमर जाने लै पर रही! हमरा त भेल जे भूत छियै! कोना प्राण बांचल से नहिं जानि ।
सोम दिन सं फेर कालेज जाय लगलहुं। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 11-03-2019

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