क्षुब्ध ( मैथिली कविता)
Created by DrPramod Kumar
"क्षुब्ध"
की बाजू
किछु याद नईं
सठिया जे गेल छी!
की लिखू
किछु ज्ञात नहिं
मूर्ख जे बनल छी।
अजुके लिय'
खाय जे बैसलहुँ
छप्पन परकार
सभ विन्यास
केओ साथ नहिं।
दु:खी छलहुं
फोन उठेलहुं
कनि बाते क' ली
जबाव भेटल
अखन 'बिजी' छी!
"भूत" मे पहुंचलहुं
किछु ढाढ़स हैत
उ गाम, उ घर
आंगन आ ओसारा
घैलची पर घैल
पाइन लवा लव
कोठी के पेट त'
"दैते" के खूनल
हरदम खाली।
मोड़ा मे छुछ भात
हाथ कहां नमहर।
ओ धनकटनी
दौनी, ओसौनी
भुक्खल बड़दक
जुन्ना सं मुंह बान्हल
ठिठुरैत कक्काक
थर थर पराती
उहो त' दु:खे दैयै
की? भबिष्यक सोचू ?
उ त' आओर भयावह
महल ओ मकान
कार ओ चाकर
की ने जोड़लहुं
की ने अरजलहुं, कहेलहुं
सभ गुण आगर
लगैय' आव सभटा
भुतही गाछी।
आब, के बनैया लाठी
के दैऐ काठी
की बाजू, की लिखू
क्षुब्ध भेल बैसल छी।
प्रमोद कुमार
पान्डीचेरी
४-११-१८
१०-०५ सुबह
pramod_drpk @ yahoo.co. in
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