नीक हमर छथि पंडीजी (मैथिली हास्य कविता)
नीक हमर छथि पंडीजी
एक जे हमर पंडीजी छथि
ऊंट सन घेंट,घोडा सन टांग
लटकल लटकल कान छनि आ
कत्तहु कत्तहु दांत।
आर त’ सभ किछ निके छनि
नाके छनि कनि टेढ़।
क्षण क्षण खैनी ठोर मे ठूसथि
नहिं त’ लेता नोइंस
जहां सम्हारै छथि ओ चश्मा
ढ़ेका जाइछन्हि खुइल।
छौंरा सभ के मजा अबै छै
दै छै पट द ‘हैंस
और त सभटा ठीके ठाक
पूछु नैं बस हुनक खुराक !
खाइ छथि पूरी सोरे चारि
लोहिया भरि तिमन दिय अजबारि
गोटैक सेर लड्डू,ओतवे जिलेबी
दही चाही दू मटकुरी
दक्षिणा यैह किछ सौ-पचास
पानक खिल्ली जरदा खास
तहि पर सं पारस ढ़ेर रास
गृहणी तकैत हेथिन्ह जे बाट
नौतक दिन खासम खास
और सभ दिन अजिर्णक वास।
प्रमोद कुमार उर्फ, “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, दी. 01-02-2019
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