जीवन का झरना
निर्झर बहते झरने का जैसे
श्रोत ही सूखा जाता है
था जीवन अपनी नदिया जैसी
कल कल निनाद कर बहता था।
कुलांचें भरता था छौना जैसा
बादल सा उन्मुक्त यह उड़ता था
चिड़ियों सी जैसी चहक थी इसकी
मृदुल गंग धारा बहता था ।
हिम राज सा था मनोबल
मृदुल मधुर आचार थे सबके
नित दिवाकर हंसकर उगता था
थी रात को चन्द्रिका राज करती ।
कोयल की कूक गुंजे कानन में
शहनाई कर्ण में मधुर घोलते थे
राह चले मिल जायें अपने
हंस हंस कर गले मिलते थे ।
भूख अधिक या प्यास प्रबल हो
चिंता नहीं सताती थी
भूखे पेट सो जाते थे
फिर भी नींद बहुत ही आती थी
अव तो झरने सूख गये हैं
नदी न नीर बहाती कल कल
हवा गर्म दुर्गंध भरा है
जीवन बस घिसटता है पल पल ।
डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 02-03-2020
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