बूंद बूंद मे उलझी जिन्दगी
बूंद हूं
बूंदें हूं
लकीर हूं
धार हूं, बहता हूं
नदी हूं, समुद्र तक जाऊंगा
जाता हूं, फिर
वाष्प हूं
उड़ता हूं, बादल बन
बिचरता हूं
फिर बूंद हूं
गिरता हूं
गिरने उड़ने में फंसा हूं
डोर से बंधा हूं
कठपुतली हूं
नचाता है
नाचता हूं।
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 05-03-2019
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