कुसुमक कांट
उपवन मे कुसुमक रंग देखि
मोन कनि भंसियाय लागल
जखने कनि लग मे गेलियै
कांट सौंसे सन्हियाय लागल
डरैत हाथ बढ़ौलियै कनिञें
सौंसे खून टपटपाय लागल
भंवरा घेरलक चहुं दिशा सं
सुंघ भोंकि तमसाय लागल
कुसुमक उर कठोर देखियौ
शोणित देखि ठिठियाय लागल
बिनु पानि के माछ जकां
ब्याकुल मन छटपटाय लागल
ऋतु बसंत गदरायल समीर
पाथर मोन पगलाय लागल
देखि पराइत रंग उपवन सं
सखी, कुसुम खिखियाय लागल
नित्य स्वप्न मे हुनके देखी
दिवश रात्रि नहिं अन्तर बांचल
बिझैल डिब्बा मे बन्द प्राणी
आन ठाम लय औनाय लागल ।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,25-03-2020
Comments
Post a Comment