चिनगी उड़तै
चिनगी उड़तै
जिनगी बनतै
बढ़ैत चलू हे! पथिक
जनै छी
पथ बड़ कठिन अछि
कांट बिछैल अछि
कीच सं पाटल अछि
रोड़ा पाथर पड़ल अछि
वसन ताड़ ताड़ भेल
घामक धार भेल
औंठा फुईट
शोनितक धार भेल
गन्तव्य अपार भेल
निराश छी!
हतास छी अहां!
चलू, चलैत रहू
पाथर सं पाथर भिरतै
चिनगी उड़तै
कीच बनत दीप
अहांक, हिम्मत बनत बाती
प्रकाश पसरतै
चिनगी उड़तै
जिनगी बनतै
डेगे डेग बढ़ैत रहू
चलैत रहू हे साथी!
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 16-02-2019
Comments
Post a Comment