उड़ान
खोढ़र से निकलने का
आतुर क्षण
परों को तौलने का
व्याकुल मन!
परखा तो हवा भरी थी
परों में
उन्होंने पूरी कोशिश की थी
खूब ऊर्जा भरी थी
भर दिया आज उड़ान मैंने
मन में उमंग है
तन में तरंग है
वृक्षराज के फुनगी को छुउंगा मैं
पर्वत राज के मस्तक को चूमूंगा मैं
होड़ लूंगा हवा से
बादलों के पार जाऊंगा
सोचता नहीं हूं
भूख की, प्यास की
गगन में उन्मुक्त विचरण का
आनंद मनाऊंगा, गुनगुनाऊंगा मैं
उड़ा हूं
उड़ता ही जा रहा हूं
क्षितिज को छुउंगा
गति बढ़ा रहा हूं
वह लाल बड़ा गोला !
क्यों भाग रहा है !
जल्दी जल्दी
हमसे तेज
फिर भी उड़ रहा हूं
कहां है क्षितिज की सीमा!
उसने पंख तो दिए
मगर
क्षितिज को अंतहीन
बना दिया!
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी ©सर्वाधिकार सुरक्षित
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