महा दानी

                   
(स्वर्गवासी पिता श्री महावीर लाल दास को समर्पित)

सदा चलाया  पकड़  अंगुली  वो
जबतक भुवन का भार मिला था
खड़े  अम्बर  के  बीच आज भी
स्वर्ग  से  दिशा  दिखा  रहे हैं।
                 शांत, शुद्ध, सिद्धहस्त  सारथी
                 गुण  के   आगर   महावीर  थे
                 झूठ, द्वेष, प्रपंच, ईर्षा के दुश्मन
                 सत्य  ईमानदारी के प्रति मूर्ति थे।
नहीं  थके न झुके कभी वो
‘कर्म  ही पूजा’  मंत्र बनाया
अडिग खड़ा प्रतिकूल वायु में
विद्या का अमर दानी थे वो।
                   बने  स्नातक  ऐसे  युग  में
                   नगर शहर में  गिना चुना था
                   शिक्षा  दान  किया जीवन भर
                   अमर  हुए महा  दानी बनकर।
अंश आपका ,कर्म वही करता हूं
गर्व  से  सीना  फुला  खड़ा हूं
दिशा  दिखाया  चला  उसी पर
धन्य  भाग्य,  यश  पाता  हूं।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
 पांडिचेरी 16-06-2019

           


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