सूनी पड़ी निगाहें
सूनी पड़ी हैं गलियां वीरान पड़े हैं रास्ते
हिम्मत नहीं किसी में पूछें कि किस वास्ते ।
चली है ऐसी कुल्हाड़ी पैर ही कट गये हैं
देखकर लहू को बहते आंसू निकल रहे हैं ।
तूफान आ रहा है या जा के सुला गया है
अव सांस पूछ रही है मुझे कब सुला रहा है ।
सारे शहर में पसरा उजाला है कि अंधेरा
आंखें पूछ रही है मुझे दिखता क्यों नहीं है।
हैं पक्षी पेड़ पर बैठे गली में कुत्ते सहमे
एक दूसरे से पूछें मनुष्य को क्या हुआ है।
डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,22-03-2020
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