पेड़ हूं
पेड़ हूं, खड़ा हूं
जड़ हूं, पर चेतन हूं
शाख हूं, खोढ़र हूं
घर हूं, घोंसला भी हूं
डाल हूं, हवा करता हूं
उसके संग खेलता हूं
पत्ते हूं, छाया करता हूं
पशुओं का भोजन हूं
फल भी हूं
मुक्त हूं
मुफ्त परोसता हूं
एहसान नहीं मानता
झुका ही रहता हूं
खड़ा हूं युगों से
झड़ता हूं, फिर पनपता हूं
मारते हो, मर जाता हूं
फिर जी जाता हूं
जन्तुओं की सेवा का
धर्म अपनाया है
इसीलिए
मर मर कर जी उठता हूं।
प्रमोद कुमार उर्फ “नेहरू लाल दास “
पांडिचेरी, 05-03-2019
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