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दिव्याक दादी (मैथिली बीहनि कथा)

 दिव्याक दादी ( मैथिली बीहनि कथा) दिव्या बड़ हठ क' देलकै। हम अमरीका जाइ सं पहिने पटना जयबे करब। प्रकाश बाबू के मान' पड़लैन्ह। एकलौती बेटी। आई .आई.टी सं पढ़ि अमेरिकाक एगो मल्टीनेशनल कंपनी में ज्वाइन कर' अगिला मास चलि जेतै। दिव्या अपन माय पापाक संग पटना पहुंचल। एयरपोर्ट सं टैक्सी बला के कहलकै “ अपने घर” बृद्धाश्रम चलह। जखन टैक्सी ओतय पहुंचलै त' माय पापा के कहलकनि ,” अहां सब एत्तहि रहू। हमरा एगो बृद्ध दादी सं भेंट करवाक अछि” ! प्रकाश बाबू दुनु प्राणी के गला सुखा गेलैन। आधा घंटाक बाद दिव्या कहलकै चलू। सब गोटे चलि पड़लाह। टैक्सी ठाढ़े रहै।  टैक्सी चल' लगलै त' दिव्या प्रकाश बाबू सं पुछलकै, “ पापा अहां सबके अहि बृद्धाश्रम मे रहवा मे कोनो कष्ट नहिं ने हैत?”  की बजैछी बेटा अहां? हम कियै बृद्धाश्रम में रहब। हमरा एतेक सुंदर घर द्वार, गाड़ी घोड़ा आ अहां सनक सुलक्षणी बेटी…! नहिं नहिं हम सोचलहुं जे दादी जखन एतय खुश भय रहि सकै छै त' अहूं सबके सुखे भेटत! तैं हम अहूं सब लय दादियेक बगल बला कोठरी आन लाइन बुक करा देलहुं। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,7-8-2020

रोचक प्रसंग-2 (नेता जी) हिन्दी संस्मरण

 रोचक प्रसंग-2 (नेता जी) मित्रो, कुछ दिन पहले मैंने अपने शैक्षणिक जीवन का कुछ अनुभव (आटो वाला लड़का)आपसे शेयर किया था। आपको बहुत पसंद आया। उससे उत्साहित होकर मैं उससे आगे का अनुभव शेयर कर रहा हूं। अव लेक्चरर के रूप में लगभग दो वर्ष बीत गये थे। मेरी पहचान एक अच्छे, मृदुभाषी, हंसमुख और विद्वान शिक्षक के रूप में बन गई थी। एच.ओ.डी भी बदल गये थे।पहले वाले का प्रमोशन प्रिंसीपल के पद पर हो गया था। जाते समय वह मेरा पीठ ठोककर आशीर्वाद दे गये थे। मुझे सच में, बहुत खुशी हुई थी और मनोवल बढ़ गया था। दूसरे वाले एच.ओ.डी सरल स्वभाव के व्यक्ति थे लेकिन उनपर स्थानीय दवाव इतना था कि चाह कर भी खुलकर मेरी बड़ाई नहीं कर पाते थे। फिर भी कभी कभी उनके मुख से सच्चाई निकल ही जाती थी। अव मुझे फाइनल इयर में कठिन पेपर पढ़ाने को दिया गया। मैं पढ़ाने लगा। माहे (पांडिचेरी का एक जिला जो केरल के कालीकट के निकट है)एक बहुत छोटा सा जगह है और वहां की जनसंख्या (1991की जनगनना के अनुसार) मात्र 34हजार थी। अधिकांश छात्र ईंटर पास कर खाड़ी के देशों में चले जाते थे। डिग्री क्लास में छात्र मिलते ही नहीं थे। इसलिए केरल के अगल बगल...

आव नहिं वनवास प्रभु (मैथिली कविता)

 आव नहिं वनवास प्रभु त्रेता मे गेलहुं चौदह बरख कलयुग मे सय पांच आव ने वन गमण हुए प्रभु सुधि लिय' भोर सांझ । हे कमल नयन हे शुभ चरण हे अजान बाहु हे दुख हरण हे पुरुषोत्तम हे गुणधाम आउ अपन गृह अपन धाम! प्रजाक प्राण फंसल छै प्रभु अदृष्य दानव नाचि रहल अछि करु संहार  अदृष्य दानव के उठाउ धनुष आ करू संधान । जन जन के आश पूर करू प्रभु राम राज्यक करु ओरियान निर्भय मानव आ पशु धन मैथिलीक पुरुख, मिथिलाक पाहुन जुड़ैत नयन ! अहांक आगमन ! अहांक आगमन! हे! श्रीराम!! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,5-8-2020

नभ छारि देलक करिया बादल (मैथिली कविता)

 नभ छारि देलक करिया बादल ससरल ससरल गुड़कल गुड़कल            नभ छारि देलक करिया बादल टंगने   जना  ओहार   के  ओ      नव कनिञां आंगन मे डोलि रहल। पवनक रथ पर चढ़ि कय बुन्नी             नव चानक मुख छै पोछि रहल दमकैत भाल उषा सन उज्जर      दामिनि जड़ि भुजि चित्कारि रहल। व्योमक चान के छै पाग खसल         अपनहि मुख के आइ दुसि रहल नुका  नुका  बादल के ठेल ठेल        नव चानक मुख अछि देख रहल। आम्रक कुंज मे  कोइली बैसल            पांचम सुर मे अछि गावि रहल  मयूर  समेट  क'  पांखि  अपन             झांखुर  मे  जा क' बैस रहल। नीरद के उर सुख व्याप्त तेहन            कोइली के गीतक साज बनल चान  वारिद  के  ओढ़ि  लेलक          तरेगण  जा  कतहु  सूति रहल। ...

सांस कियै उखड़ल उखड़ल (मैथिली कविता)

 सांस कियै उखड़ल उखड़ल आइ  सांस  कियै  एहन  तेज चलय हम  त' छी  ओहिना   बैसल  तैसल           ई   देह  कियै  एतेक   धीपल  अछि           छै  घर   मे   सौंसे   छाहरि   पसरल आगि  छै   पजड़ल  ओहि   चुलहा  मे त'  हमर   हृदय   कोना  धधकि  रहल           जहि  छाहरि  लय  गेल   गाछ  रोपल           कियै   पात  के  ओ अछि झाड़ि रहल  सब   दिन    सिंचलहुं    जीवन  अनकर अपनहि  जीवन   कियै  जड़ल  पजड़ल           सोझरहवैत    रहल    अनकर    जिवन           अपनहिं   जीवन    ओझड़ल  पोझड़ल आव  ...

दुबला प्रेमचंद (तेरे जैसा न हुआ न होगा! कलम के सिपाही! मुंशी प्रेमचंद! श्रृद्धांजलि!)

धनियां को एक धोती देदे रविया को दो रोटी गाय को देदे घास का बंडल बैल के गले में घंटी। दलित लाचार को देख देखकर प्रेमचंद का अक्षर अक्षर रोया फटी धोती, घिसे जूते ठोकर खा खाकर लिखता था दशा सुधर जायेगी एक दिन सपना देख लिया था। “धनपत “ रहा धन हीन सबदिन दुबली पतली काया आज जो होता वह दुबला धनपत क्या मोटा हो पाता ! क्या कर सकता था वह सिपाही था कलम का घिसता कलम या कि जूते चिंता ने उसको इतना घेरा विजय का पथ दिखाने वाला कठिन रोग का ग्रास बना तुम मिट गये धनपत, क्या हुआ सफेद पट पर लिखे काले अक्षर धरोहर बने ! अमर हो गये ! अफशोस कि धनियां अभी भी रोती रवि की आंखें फटीं फटीं गया विदेशी लूट को लेकर देशी लुटेरों का दल बनाकर ! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,31-7-2020

बड़ नीक रसगुल्ला मिठाई (मित्र दिवश पर मित्र सब करें हसगुल्ला भेंट) मैथिली कविता

बड्ड नीक रसगुल्ला तों बड्ड नीक रसगुल्ला तों         अनमन जेना बौगला तों पाछां जे ठाढ़ तोहर छौ          बड्ड दीब पेनतोआ छौ।    ईमरती जिलेबी छै रसदार         मखमल  जकां  मोती चूर विना ब्रेक के  आवै जाइजो         मुंह सं  आव खसैया लाड़। मोन मे बसल रसमलाई          होइत अछि जे खूबे खाइ वाट  तकैया  चन्द्रकला           दोड़ै छी जे परा ने जाय । घेबर के त' बात  ने पुछू          खाइत रहू आ घी टपकैत नहू नहू घुलि जैत बतासा           तुरत्ते मुंह  में जा बिलैत । काजुक  बर्फी  आ श्रीखण्ड         मोहन भोग गाजरक हलुआ चूरमा मोरब्बा सोन पापड़ी            करैत  रहैया  हमरा तंग। हौ  पेड़ा  तों  नहिं  नुकाह          तोरा संग  बड्ड जुड़ल याद चारि आना...

लाल दीदी (मैथिली कविता)

लाल दीदी अनुभवी मुखमंडल प्रश्न सं भरल आंखि जेना ज्योति बहराइत टुकुर-टुकुर ताकि रहल छल  अनवरत हमरे दिश बस मे बैसल छल बाहर सं केओ बजौलकै उतर' लागल नज़रि हमरे दिश टांगल, लटकल ' नेहरू' रौ.......! नईं चिनलही ? हम अवाक । के भ' सकैत अछि मुदा छी मुग्ध 'नेहरू' जे बजौलक हम हूं उतरि गेलहुं फेर वैह प्रश्न नहिं चिनलही ? गोर लगलियै पांझि मे भरि लेलक  दुनू हाथें  दुनू गाल थपथपेलक  आंखि मे नोर  हमरो, ओकरो  अकस्मात लागल  'ई' त' मायक स्पर्श  मुदा ओ त' स्वर्गिय... तखन 'ई' के  एहन ममता, एहन दुलार  कहिया भेटल रहै  किछु स्मरण नहिं  आश्चर्यित छलहुं  कोनों सपना त' नहिं  तखने ओ बाजल  हम छियौ  "लाल" दीदी  आव चिनलही ? गला भरि गेल  स्वर मे थरथराहट  कोनों तरहें बजलहुं  हां, तीस बरस के बाद  आई देखलियौ  क्षमा करिहें  तोरा सनक नजरि जे नहिं अछि ‌‌‍‍‌ पता नहिं ई गाड़ी ‌ कत्त तक जैत  परन्तु आव  चलत सना-सन दना-दन  दुनू गाल पर  दीदीक थपथपाहट जे अछि । प्रमोद कुमार(नेहरू) पांडिचेरी

फेल भ' गेलहुं (मैथिली कविता)

मित्रगण अपनेक सेवा मे एकटा अनुभव प्रस्तुत क' रहल छी। नीक लागै या बेजै ,नि:संकोच लिखब से आग्रह।                        फेल भ' गेलहुं परीक्षाक ड्युटी छल हाॅल में पहुंचलहुं  काॅपी बांटि देलियै घंटी पड़लै प्रश्नपत्रो द' देलियै कनी दम धेलहुं          देखलियै केओ नहिं         लिख रहल छल         ब्यंग्य केलियै         आव बुझू         क्लास एटेंड नहिं कैलाक फल          कंनी कुढ़लहुं         अहिना हैत। फेर हम चुप ओहो सभ चुप, स्थिर मोन में आयल देखियौन्ह ने केहेन भोला बाबा बनल छथि जनै छथि सत्यानाश तक मूंह जे बनौने छथि जेना हिनका सभ सं मासूम केओ अछिये नहिं         अखनों सभ शांत           हमर बेचैनी बढ़ल           तखनहि एकटा पूछलक           आव लिखू?         ...

कटही गाड़ी (मैथिली कविता)

कटही गाड़ी कटही   गाड़ी   हूं   ऊं   हूं हाल  चढ़लै, बान्ह   पड़लै धूड़ा  में  छुछ  सन  घुसलै बाजि रहल अछि चूं-चूं-चूं।                    कटही गाड़ी.......... धानक बोझ लदने  जाइछी बाजे  अंग-अंग,   ची-चूं-ची बड़दक घंटी  संग-संग बाजै गृहणीक पायल छुन-छुन-छूं।                      कटही गाड़ी............. कनियां त' खरिहान निपति छथि मैंयां    ढ़कक   छेद   मुनै   छथि ढ़ेकी,  उखड़ि,   समाठ    धोवेलै चूड़ा     कुटेतै      धम -धुम -धूम                       कटही गाड़ी........... कनियां-पुतरा   सब भ'  जेतै कोठी, झप्पा  सेहो  भरि जेतै 'अन्न धन'जे आबि रहल छथि मूंसो  आव  बाजत  चूं-चें-चूं।       ...

आन्हर (मैथिली लघु कथा)

आन्हर                      (एकटा लघु कथा) चूं--चीं--धक, हल्का झटकाक संग गंगासागर एक्सप्रेस सियालदह स्टेशन पर रूकि गेल।सभ उतरनिहार। बड़ पैघ आपा-धापी।कुली सबक दौरम- दौर। अपार जनसमूह। जत' देखूं, मुंडक-मुंड।एको डेग चलब कठिन!कनियां के कहलियनि," सुखदा! कनि रूकि जाऊ।भीड़  कम हुअ' दियौ। नहिं त' कत्त' क' धकेलत, खसब आ' हाथ पैर टूटत से नहिं जानि। दुनू गोटे कात भ' क' ठाढ़ भ' गेलहुं। भीड़ छंटलै। " सुखदा "आव चलू" ।हम दुनू हाथे दूटा बैग, पहिया वाला, गुड़कबैत चललहुं।अनेकों बैग, अनगिनत हाथ, किन्तु आवाज एक्के-" घर्र घर्र, चर्र चर्र, घिस, घिस, जेना लाइन सं अनेकों कटही गाड़ी चैल जा रहल हो।सभ यात्रि एके दिशा मे आगू बढ़ैत। मुदा गंतब्य भिन्न। हमरो सभ के सांझ में 5.30बजे फ्लाइट छल। मद्रास के लेल।सोचलहुं," सियालदह टीशन पर उच्च क्लास प्रतिक्षालय में साफ-सफाई नीक छै। एयर कंडीशन सेहो छै।ओतहि जा क' कनि फ्रेश होयब, जलखै करब,सामान सभ अमानती घर में राखि, दू- चारि घंटा घुमव-फिरव,। तखन प्री पेड टैक्सी ल' एयरपोर्ट चलि जायब।घूमि क' पाछां देखलहु...

क्षुब्ध ( मैथिली कविता)

Created by DrPramod Kumar                               "क्षुब्ध" की बाजू किछु याद नईं सठिया जे गेल छी! की लिखू किछु ज्ञात नहिं मूर्ख जे बनल छी। अजुके लिय' खाय जे बैसलहुँ छप्पन परकार सभ विन्यास केओ साथ नहिं। दु:खी छलहुं फोन उठेलहुं कनि बाते क' ली जबाव भेटल अखन 'बिजी' छी! "भूत" मे पहुंचलहुं किछु ढाढ़स हैत उ गाम, उ घर आंगन आ ओसारा घैलची पर घैल पाइन लवा लव कोठी के पेट त'  "दैते" के खूनल हरदम खाली। मोड़ा मे छुछ भात हाथ कहां नमहर। ओ धनकटनी दौनी, ओसौनी भुक्खल बड़दक जुन्ना सं मुंह बान्हल ठिठुरैत कक्काक  थर थर पराती उहो त' दु:खे दैयै की? भबिष्यक सोचू ? उ त' आओर भयावह महल ओ मकान कार ओ चाकर की ने जोड़लहुं की ने अरजलहुं, कहेलहुं सभ गुण आगर लगैय' आव सभटा भुतही गाछी। आब, के बनैया लाठी के दैऐ काठी की बाजू, की लिखू क्षुब्ध भेल बैसल छी। प्रमोद कुमार पान्डीचेरी ४-११-१८ १०-०५ सुबह pramod_drpk @ yahoo.co. in

लोरी (मैथिली कविता)

लोरी       हे  यौ   बौवा    सुइत   रहू       औंठा सं अहां अमिय चुसू       चानों आव डुबल गगन  मे       तारो  सभ  भेल  उड़न- छू                          हे यौ बौवा.........!                        लक्ष्मी माता कोरा  लेती                       सरसत्ती मां गीत सुनौती                       गौड़ी मां के झूला पर जा'                       झुलैत रहूं अहां नहूं- नहूं                                 हे यौ बौवा...........!        देखियौ  कत्ते  राइत   भेलै       ...

ईमान बेचता हूं (हिन्दी व्यंग्य कविता)

ईमान बेचता हूं हां, मैं ईमान बेचता हूं रोज ही ग्राहक आते  हैं कोई मोटा, कोई पतला कोई बड़ा रसूख वाला             मैं कितना ईमानदार       किसी को नहीं लौटाता       जो जितना देता है       ले लेता हूं       वादा कर लेता हूं       ईमान बेचता हूं। उसबार तो हद ही कर दी बहुत बड़ा रकम पाया पूरे परिवार का मिलेगा भरोसा दिलाया दिया किसी और को क्या करूं गर्व करता हूं फिर भी वह देश बेचता है मैं ईमान बेचता हूं।       पिछले बार उसने कहा       पुरुषोत्तम को        आराम दिलाऊंगा       तंबू से निकाल कर       महल में रखुंगा       पहली बार ईमान न बेचा       लेकिन इस बार वादा करता हूं बड़ा बेईमान बनुंगा सभी सीमा लांघकर ईमान बेचुंगा। प्रमोद कुमार "नेहरू" पांडिचेरी दि. 15-12-2018 सायं-7-05 बजे

हत प्रभ (मैथिली कविता)

हतप्रभ गाल पर हाथ कपार पर चिंताक लकीर आंईखो डबडबायल घोर निराशा आ' पश्याताप की सोचलहुं की भ' गेल बच्चे रही बियाह भ' गेल बच्चा सभ नहिं जिबैत रहैय साउस रहथि,  मायक दोसर रुप बड्ड मानथि दैवक माया, मलेरिया खा गेलनि! आव नितांत एसगर! लोक सभ कहलकै हुनका दोसर बियाह क' लिय' मुदा नहिं विद्वान रहथि अत्यंत बिचारशील हमरे मे अपन सुख देखलनि हे दिनकर! हे दीनानाथ!!  कोख सजाउ! कोर भरू! हहाकार! चित्कार!  गुंजा दिय आंगण किलकारी सं 'अरग' चढ़ैब, 'एकादशी' करब कथा सुनब!  दिनकर सुनि लेलनि! आई आंगण भरले-पुरल नहिं                               कोंचल अछि ! बाल- गोपाल सभ सं आई जे' ऊ' रहितथि गद-गद होइतथि! ईश्वरक लीला!       पाईनभरनी नहिं अएलै आई       बर्तन- बासन सभ अईंठे       भनसिया के कहि देलियै       एगो थाड़ी धो' क'       ओही मे परोसि दियौ       बच्चा सभ खा लेतै       लिय! भ' गेलै बलाय!       तमाश...

प्यासल बादल (मैथिली कविता)

प्यासल बादल सिन्धु अरब मे जन्म लेलहुं हम प्रिय  भूमि  मे  पाओल   प्रवेश प्रिया मिलन  के  आश  सजौने पश्चिम   घाट  सं   ठानल   द्वेष           प्रिया मिलन मन संचित रहि गेल           प्रचंड  वेग  रथ  बान्हल   देखल           उदंड    समीर,  कुढ़नी   दामिनि           बाट   तकैत,  बाटहि  मे   भेटल अहिंक आदेश जानि क , प्रिय हे!  चारि मास धरि रण- वन  घुमलहुं कतहु क रिमझिम,कतहु क भारी बूंद-  बूंद   या      धार     बहेलहुं           सखि सभ के झूला पर झुलैत           गीत सुहावन  गाबति   देखल           वन बिच मोर नाचि रहल छल           मुख किसानक चमकैत देखल जड़ल दुईभ, झुलसल झड़- झांख...

चिड़ैयक चाह (मैथिली कविता)

चिड़ैयक चाह एक चिड़ैया फुनगी पर बैसल चिड़ी खोदियाबैत देह चिड़ै तकैया' दिग- दिगंत किम्हर हमर देश! युग बितल छोड़ि एलहुं अपन माइट, पाइन ओ भेष ननमुन सभ के पांईख भेलै भरलै हवा अशेष क्षितिज के छुअब अपने रंग अपने ढ़ंग मुदा सभ के एके तरंग। चिड़ै के खोंता बड़ दिबगर धनहर खेत खेनिहार कहां स्वादहीन  अन्न ओ ब्यंजन!  चलू हे चिड़ी खसले मड़ैया मे खोंता बना लेब क्यो चिन्है वा नहिं मगर वैह माइट वैह पाइन पांईख सं लगालेब रोम-रोम मे नव प्राण त' जागत! लोहारक धौंकनी हरवाहाक घुरकी चरवाहाक चुरकी सं चुबैत तेल कंसारक मुरही आंकड़  पाथर फुदुकि-फुदुकि फांकब काटि लेब जीवन शेष! प्रमोद कुमार उर्फ" नेहरू लाल दास" पान्डिचेरी दि. 25-12-2018 ( हमर धर्म पत्नी श्रीमति कल्पना कुमारिक जन्म दिनक पुर्व संध्या पर सस्नेह भेंट)

पुष्पक गति (मैथिली कविता)

पुष्पक 'गति' अहि बेर 'ओ' पुछलनि की बनब' झट द कहलियनि फूल बना दिय' फुलबारी बसैब रंग-बिरंगक रुप धरि ललना के लहड़ैब! बुझलहुं नहिं, पर कियो झुलैत  कियो डोलैत  कियो दिनभरि गों गों क' गीते सुनैत। मूर्ति पर चढ़बै लै सेज सजबै लै जूड़ा मे गूंथै लै त केओ चिता पर  चढ़बै लै, जरबै लै वा, नहिं त'  वीरक पथ पर ओछवै लै तोरि ल' जैत। हम कानी, खिझी नहिं-नहिं, दया करु हमरा सुगंध पसारैक अछि  वायु रथ पर  चढ़ि दश-दिशा गमकबैक अछि  मुदा के सुनैया! झकझोरि तोरैया अपन पथ सं मोड़ैया  पुछितो नहिं अछि दर्दो भेल ? की सोचलहुं  आ की भ' गेल !! प्रमोद कुमार, उर्फ "नेहरू लाल दास" पांडिचेरी दि.28-12-2018 रात्रि-10.35बजे

स्वागत हे नव वर्ष (मैथिली कविता)

स्वागत हे नव वर्ष! कोयलिक कूक  गूंजै  ओहिना शहर, गाम   ओ'  घर   अंगना गाय    बहाबथि  धार  दूध  के माखन लेपथि वालक ओहिना।           मित्र बनथि सभ, शत्रु ने कोई           फरै  आम,  महुआ  खुब चूबै           खिलै फूल सभ रंग बिरंग के           हाथ   मगर  ने   लगबै  कोई। हे!  अठारह  जा  रहल छी ! याद त' बहुत  आयब  अहां मित्र बनौलहुं बहुतों अहिवेर जीत लेलहुं जेना तीन जहां।           नैं कोनों दु: ख, आ ने बाधा           आवै  ककरो  आगां- पाछा           हे! उन्नीस आऊ प्रसन्नचित           प्रेम- प्यार बहाउ एकछाहा। सुख शांति  रहै, सद्बुद्धि  बढ़ै सभ केओ सुख सं फूलै- फलै किलकारी   गूंजै   आंगन   में चहुं ओर अनुपम ज्योति जलै। प्...

एक उल्लू! दोसर उल्लू (मैथिली व्यंग कविता)

एक उल्लू! दोसर उल्लू!! उल्लू के देखलियैया' नहिं ने! कोना देखवै राइत क' निकलै छै कोटर में ,खोधर में रहै छै निहायत सुन्दर! गोल-गोल मुंह ठाढ़, छोट नाक पनिगर,चंचल आंइख पातर- पातर ठोर ताहु पर लक्ष्मिक वाहन! विधिक विधान देखू! डरल- डरल, सहमल- सहमल! कखनों कोनों डारि पर, त' कखनों कोनों मुड़ेड़ पर बेचारा! तैयो लोक ओकरा कहै छै "उल्लू" यानि...  नहिं जानि ,ओकर नाम उल्लू कियै पड़लै ,वा अर्थ खराब कियै लगलै खायर जै दियौ ऊ त' चिड़ै अछि, हर्ज नहिं। आव एमहर ताकू! देखियौ, एकटा ईहो उल्लुवे अछि कहबैया' आदमी! बड़का वंश ! आगा- पाछां, बड़का हजूम हां ,हां ठिके पकरलहुं ओहो सभ आदमिये कहबै छै! पर, मक्कार, फुसि बजवा, देश बेचवा! अनघोल मचौने अछि  मुदा करिया कोट आ' उजरा पैंट वला सभ के संरक्षण में रहैया निश्चिंत, निर्विघ्न! अपना के होनहार बुझैया' शिर्ष पर बैसै के  जोगार लगबैया! प्रमोद कुमार, उर्फ " नेहरू लाल दास" पांडिचेरी, दि. 06-01-2019 12.45PM