आव नहिं वनवास प्रभु (मैथिली कविता)

 आव नहिं वनवास प्रभु


त्रेता मे गेलहुं चौदह बरख

कलयुग मे सय पांच

आव ने वन गमण हुए प्रभु

सुधि लिय' भोर सांझ ।


हे कमल नयन हे शुभ चरण

हे अजान बाहु हे दुख हरण

हे पुरुषोत्तम हे गुणधाम

आउ अपन गृह अपन धाम!


प्रजाक प्राण फंसल छै प्रभु

अदृष्य दानव नाचि रहल अछि

करु संहार  अदृष्य दानव के

उठाउ धनुष आ करू संधान ।


जन जन के आश पूर करू प्रभु

राम राज्यक करु ओरियान

निर्भय मानव आ पशु धन

मैथिलीक पुरुख, मिथिलाक पाहुन

जुड़ैत नयन ! अहांक आगमन !

अहांक आगमन! हे! श्रीराम!!


डॉ प्रमोद कुमार

पांडिचेरी,5-8-2020

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