दुबला प्रेमचंद (तेरे जैसा न हुआ न होगा! कलम के सिपाही! मुंशी प्रेमचंद! श्रृद्धांजलि!)
धनियां को एक धोती देदे
रविया को दो रोटी
गाय को देदे घास का बंडल
बैल के गले में घंटी।
दलित लाचार को देख देखकर
प्रेमचंद का अक्षर अक्षर रोया
फटी धोती, घिसे जूते
ठोकर खा खाकर लिखता था
दशा सुधर जायेगी एक दिन
सपना देख लिया था।
“धनपत “ रहा धन हीन सबदिन
दुबली पतली काया
आज जो होता वह दुबला धनपत
क्या मोटा हो पाता !
क्या कर सकता था वह
सिपाही था कलम का
घिसता कलम या कि जूते
चिंता ने उसको इतना घेरा
विजय का पथ दिखाने वाला
कठिन रोग का ग्रास बना
तुम मिट गये धनपत, क्या हुआ
सफेद पट पर लिखे काले अक्षर
धरोहर बने ! अमर हो गये !
अफशोस कि धनियां अभी भी रोती
रवि की आंखें फटीं फटीं
गया विदेशी लूट को लेकर
देशी लुटेरों का दल बनाकर !
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,31-7-2020
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