नभ छारि देलक करिया बादल (मैथिली कविता)

 नभ छारि देलक करिया बादल


ससरल ससरल गुड़कल गुड़कल

           नभ छारि देलक करिया बादल

टंगने   जना  ओहार   के  ओ

     नव कनिञां आंगन मे डोलि रहल।


पवनक रथ पर चढ़ि कय बुन्नी

            नव चानक मुख छै पोछि रहल

दमकैत भाल उषा सन उज्जर

     दामिनि जड़ि भुजि चित्कारि रहल।


व्योमक चान के छै पाग खसल

        अपनहि मुख के आइ दुसि रहल

नुका  नुका  बादल के ठेल ठेल

       नव चानक मुख अछि देख रहल।


आम्रक कुंज मे  कोइली बैसल

           पांचम सुर मे अछि गावि रहल 

मयूर  समेट  क'  पांखि  अपन

            झांखुर  मे  जा क' बैस रहल।


नीरद के उर सुख व्याप्त तेहन

           कोइली के गीतक साज बनल

चान  वारिद  के  ओढ़ि  लेलक

         तरेगण  जा  कतहु  सूति रहल।


डॉ प्रमोद कुमार

पांडिचेरी,3-8-2020

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