अम्बर को छूऊं
बहुत बड़ा तुम करना प्रभु मुझको
हाथ बढ़ा कर अम्बर छूऊं
ज्ञान की वर्षा करूं वहां से
सम्पूर्ण धरा को सिंचित कर दूं
स्निग्ध धरा पर कोपल नव फूटें
हरितिमा की चादर फैले
खग मृग खेलें भय विहीन हो
बहे प्रेम की सरिता कल कल
मानवता की झरना झर झर
पर एक उपकार करना प्रभु मेरे
इतना भी बड़ा न बनाना मुझको
चौराहे पर मूर्ति बनकर
कौवे बीट करें सिर बैठे
नहीं बनाना डाक टिकट तुम
रोज रोज ठप्पा खा खा कर
विकृत मुंह ले बाहर निकलूं
इतनी ही दया करना प्रभु मुझपर
पंक्तियों में नाम सजाना
पुस्तक बन जायें चिर गृह मेरा
पाठक का मुख देखूं और मुस्काउं !
डॉ.प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,18-04-2020
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