अक्षर बन आऊं धरती पर
अक्षर बनकर आऊं धरती पर
शब्द बनूं और अर्थ धरूं फिर
पन्ना दर पन्ना बढ़ता जाऊं
बन पुस्तक, और फिर लग जाऊं ।
हर अक्षर एक दीप बने प्रभु !
जैसे नभ में तारों की लड़ियां
लड़ी दर लड़ी घरों में टंग कर
घनघोर तिमिर को दूर भगाऊं ।
कण कण बादल जल पीता है
फिर कर प्रयत्न अम्बर चढ़ता है
जहां भी हरियाली जलता देखे
बूंद बूंद फिर बरस जाता है ।
लेती अंगराई जीवन फिर से
रिक्त नीरद मिलता अर्णव से
फिर से अपना रूप सजाता
कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ जाता ।
प्रकाश पुंज न बनना मुझको
बिम्ब बिम्ब ही रखना प्रभु मेरे
जहां तिमिर की कालिख फैले
मैं दौड़ वहीं जा टिम टिमाऊं !
मुक्ति की चाह मुझे नहिं प्रभु जी
जनम जनम यही करता जाऊं
प्रभु ! जबतक तेरी रचना भू पर
बन बादल जल भरूं और बरसाऊं।
डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी, 23-04-2020
Comments
Post a Comment