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शब्द:निस्तब्ध (हिन्दी कविता)

शब्द: निस्तब्ध एक शब्द निकला था  कांधे पर कराहने का बोझ लिये थरथराते टांग  मुंद -मुंद जाती आंखें घिसट रहा था  लकड़ी के सहारे  पहुंच ही गया  भूपति के शहर में  घनघोर घटा घिर आये  ढ़न ढनाक ढ़न गर्जना  कौंधता आशा का प्रकाश  हिम राज समान घोषणा  इतना बरसेगा आज  मरुभूमि में भी तृण पनपेगा  काश! पता होता  पीछे तूफां छुपा लाया है उत्सव खत्म हुआ  उड़ गया सब कुछ  टूट गयी लकड़ी  शब्द :निस्तब्ध!  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 26-04-2019

सखी रे हमर पिया कठोर (मैथिली गीत)

सखी रे हमर पिया कठोर  जखन चिड़ा -चिडि चोंच लड़ावै डाइढ़ कें डाइढ़ गला लगावै  वैरी  बदरिया  फुहार   उड़ा  क’  हिलरावै  मोर  मधुखान  रे                                                                             सखी रे मोर पिया कठोर । चमकै चान व्योमबिच  जखने, उठै हिलोर हिया मे हमरा  अधर मधु टपकावै रहि रहि, बैरी पिया  बसथि बर दूर रे                                                                            सखी रे मोर पिया कठोर । मंद  समीर  मधुर  धुन गावै ,भंवरा भन भन राग सुनावै पुष्प पुष्प सं पान मधु करि ,उरि  जाय  दोसर...

फोन अएलैया गाम सं (मैथिली गीत)

फोन अएलैया गाम सं  फोन अएलैया  गाम सं जे आम फड़लै जी जान  सं  जखने गर्मी छुट्टी भेलै  पहुंचि गेलहुं सभ गाम पर                                   फोन अएलैया गाम सं .........।  बंचल सिन्दुरिया एक्के आध केरवी पकै  खुब धुरझार  बम्बई के त’ स्वाद  ने  पुछु  मालदहो आव अछि  तैयार                                        फोन अएलैया गाम सं......। चलै  चलू  सभ  लग्गी  लेने   बोड़ा  लेने पथिया लेने तोरिहें मालदह पहिले जाक' कलकतिया के वाट देख                                    फोन अएलैया गाम सं .........। हम त खैवौ घिबहा पहिने बिज्जू मे  तव चोभा  लगैब  फैजली भदैया ताकत जं त' कहवै तों सभ  बाट ताक       ...

मजदूर मजबूर (हिन्दी कविता)

मजदूर मजबूर (मजदूर दिवस पर उनको ही समर्पित)  भाल पसीना पैर है खाली  होंठ  हों जैसे सूखी नाली आंखों में न चमक कहीं है लगती हैं दो गहरी प्याली।  किसका कितना बोझ उठाये   डगमग  करता  यह  बेचारा  नर हो या फिर  हो यह नारी नहीं  अलग है  कोई कहानी  हार तोड़ मेहनत करता यह  जाड़ा  गर्मी वर्षा और बसंत  पीढ़ी  दर  पीढ़ी हाल यही है  दीखता  नहीं  है  कोई   अंत  कहता नेहरू लाल कवि यह  टूटेगा यह  दुष्चक्र तभी जब  मानवता  जाग्रित  हो सब में शोषण  न  हो  पायेगा  तव खेत से  निकले या फैक्टरी से  अट्टालिका  से या खदान से  या आटा चक्की से निकला हो  भूत ही लगता नहीं मानव यह  दो   रोटी   खाकर  सो  जाता  हड्डी को फिर खींच के लाता ऊर्जा हीन  पुतला यह मानव  उजला होगा क्या कल इसका।  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 01-05-2019

आरे बदरा कारे बदरा (मैथिली गीत)

आरे बदरा कारे बदरा  आवि  जो  बदरा  करिया  बदरा  चढ़ि   पवन के रथ पर  तूँ ईन्द्रक  आशिष लेने  अबिहें  उमरि  घुमरि  खुब  बरसैं   तूँ               आरे बदरा करिया बदरा खूब क धूम मचा दे तूं । नभचर प्यासल थलचर  प्यासल फाटल धरतिक  छाती  रे  घास  पात   सभ  भुस्सा   भेल छै  पछवा  तन झड़कावै रे                                   आरे बदरा करिया बदरा...... । पीट  नगारा  अबिहैं  बदरा  चमका तड़तड  बिजली  तूं पेट  मे  पानि  भरि  क’ अनिहैं धराक  छाती  जुड़ा  दे तूं                              आरे बदरा करिया बदरा........... । सोन्हगर माटिक  गन्ध  पसरतै  वन  बिच मोर  त नचतै रे झूला...

गणेश स्तुति (मैथिली कविता)

गणेश स्तुति  हे  गणपति  गण  नाथ  विनायक  मोदक प्रिय अहां विघ्न विनाशक  एकदंत    गज     बदन    मनोहर  प्रथम   पूज्य   अहां  हे  लम्बोदर                       हे गणपति गण नाथ विनायक ।                                                   हे   गौरी  सुत   वाल  गजानन                                   शंकर पुत अछि त्रिशूल चानन                                  विद्या  वारिधि  बुद्धि  के  दाता                            ...

बगड़ाक नोर (मैथिली कविता)

बगड़ाक नोर  की हे बगड़ा  किये भिजल अछि  पलक अहां के  कियै भरल अछि नोर!  छलै बुझल जे  अहां नञ कनै छी  उठल कोनाअहांक हृदय मे  एहन जोर हिलोर!  शहर भेल अछि गाम घर आव  महल बनल सभ फूस  नहिं पोखरि ने खधिया खत्ता  कत’ भिजायब ठोढ़ ! गाछ -बृक्ष पर आंखि गरौने  बाट तकैया चील  गायक घर आव बनल गौशाला  कहां बनावी नीड़ ! नहिं दलान आ कक्का दादा  नहिं दादी ओ आंगन  शुभ मानि मैंञा के हाथक  कहां भेटैया अन्न!  हमर अस्तित्व पर बजरल खतरा  भेले बुझू अंत।  प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 09-05-2019