मजदूर मजबूर (हिन्दी कविता)

मजदूर मजबूर (मजदूर दिवस पर उनको ही समर्पित) 

भाल पसीना पैर है खाली 
होंठ  हों जैसे सूखी नाली
आंखों में न चमक कहीं है
लगती हैं दो गहरी प्याली। 

किसका कितना बोझ उठाये  
डगमग  करता  यह  बेचारा 
नर हो या फिर  हो यह नारी
नहीं  अलग है  कोई कहानी 

हार तोड़ मेहनत करता यह 
जाड़ा  गर्मी वर्षा और बसंत 
पीढ़ी  दर  पीढ़ी हाल यही है 
दीखता  नहीं  है  कोई   अंत 

कहता नेहरू लाल कवि यह 
टूटेगा यह  दुष्चक्र तभी जब 
मानवता  जाग्रित  हो सब में
शोषण  न  हो  पायेगा  तव

खेत से  निकले या फैक्टरी से 
अट्टालिका  से या खदान से 
या आटा चक्की से निकला हो 
भूत ही लगता नहीं मानव यह 

दो   रोटी   खाकर  सो  जाता 
हड्डी को फिर खींच के लाता
ऊर्जा हीन  पुतला यह मानव 
उजला होगा क्या कल इसका। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 01-05-2019

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