बगड़ाक नोर (मैथिली कविता)

बगड़ाक नोर 

की हे बगड़ा 
किये भिजल अछि 
पलक अहां के 
कियै भरल अछि नोर! 
छलै बुझल जे 
अहां नञ कनै छी 
उठल कोनाअहांक हृदय मे 
एहन जोर हिलोर! 
शहर भेल अछि गाम घर आव 
महल बनल सभ फूस 
नहिं पोखरि ने खधिया खत्ता 
कत’ भिजायब ठोढ़ !
गाछ -बृक्ष पर आंखि गरौने 
बाट तकैया चील 
गायक घर आव बनल गौशाला 
कहां बनावी नीड़ !
नहिं दलान आ कक्का दादा 
नहिं दादी ओ आंगन 
शुभ मानि मैंञा के हाथक 
कहां भेटैया अन्न! 
हमर अस्तित्व पर बजरल खतरा 
भेले बुझू अंत। 

प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास 
पांडिचेरी 09-05-2019

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