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महा दानी

                    (स्वर्गवासी पिता श्री महावीर लाल दास को समर्पित) सदा चलाया  पकड़  अंगुली  वो जबतक भुवन का भार मिला था खड़े  अम्बर  के  बीच आज भी स्वर्ग  से  दिशा  दिखा  रहे हैं।                  शांत, शुद्ध, सिद्धहस्त  सारथी                  गुण  के   आगर   महावीर  थे                  झूठ, द्वेष, प्रपंच, ईर्षा के दुश्मन                  सत्य  ईमानदारी के प्रति मूर्ति थे। नहीं  थके न झुके कभी वो ‘कर्म  ही पूजा’  मंत्र बनाया अडिग खड़ा प्रतिकूल वायु में विद्या का अमर दानी थे वो।                    बने  स्नातक  ऐसे  युग  में              ...

सूतल राजा, मरैत प्रजा

                हे भगवान खोलू आंखि जकरा देखि देखि भाल चमकैया वैह चमकी सं मरि रह’लै नित दिन गिनती बढ़ले जाइयै क्यो निरीक्षण कर’  अवैया' क्यो रिपोर्ट झट मंगवैया ए .सी घर ए. सी  कार शान ओ शौकत के ब्यापार ब्यापारी ई राजा बड़का दय आश्वासन चमकी गोल किछु टाका छै लू के मोल पाई फेक क’ चलैत बनैत अछि चमकी सं मरैया बालक युवा वृद्ध के खाइया लू हे ईश्वर अहां की करै छी की अहूं छी बैसल एसिये मे छोड़ि आलस अहां बाहर निकलू बुझवै जखन लागत लू! प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास  पांडिचेरी 18-06-2019

बाल गोपाल

                                      हे  नन्द लाला बाल गोपाला आजा मेरी बगियन में मैं बन जाऊं माखन तेरा लिपट जाऊं तेरे आनन में या बनाकर  मिसरी  की डलिया तेरे मुख घुल जाउं जनम जनम  की साध  हो  पूरी तेरे में मिल जाऊं                     या बन जाऊं घट  माखन का तेरे कर फुट जाऊं मैं                     खेलें तेरी  अंगुली जिसपर  बंसी वही  बन जाऊं मैं                     अपनी बंसी का धुन बनाकर मन में ही रख लेना तूं                     या  मुझे बनाकर डोरी कदम्ब पे झूला डाल लेना तूं मैं  बन  जाऊं कदम्ब  की डाली  धुन मुरली की छेड़े तू तुम्हें   देख  नाचेंगी  गोपियां   मेरे  मन  में...

कोना हम मृत्यु पर नाचू

    छाती फाटल हमर ओहि दिन           निर्भयाक जहि दिन प्राण गलै। चारि टा जीव टंगा गेल भोरे           ओकरो प्राणक अवसान भेलै। एकटा टांग टुटल ओहि दिन            दोसरो आइ टूटिये गेल भाई। हम संसारिक,  नहिं छी मसानी            नाचू कोना क्यो दिय' बताय। करोड़ों असुर देवता सब मारलथि           रावण संग लाखों मारलथि राम। फेर करोड़ों मरला महाभारत मे          तैयो नहिं बदलल अछि परिणाम। मनुख मात्र एक जीव बनल अछि          सोच विचार के छोरि चुकल अछि। भाय बहिन नहिं सूझै छै ककरो           मात्र स्त्री पुरुष मे बंटा गेल अछि। कलयुग जेना चोटी चढ़ल अछि             प्रलय निकट  देखा रहल अछि। हमत' देख रहल छी भाई सब            सबहक गरदनि टंगा रहल अछि। डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,20-03-2020

काकी गीत

                            (मित्र लोकनि, हम एकटा गीत लिखवाक प्रयास कैलहुं अछि। अहि गीत मे ओहि तरहक ब्यक्तिक मनोभाव परिलक्षित कैल गेलै, जे वर्षों पहिने जीवन यापनक क्रम मे गाम छोरि परदेशी भ’ गेलाह। बाल -बच्चा सभ पढ़ि -लिखि, विवाह दान कय आन आन ठाम जिवन जी रहल छथि। आव ई दुनु गोटे बूढ़ आ असमर्थ भ’ गेल छथि। प्रतीकक रुप मे कौआ के अपन मोनक उद्गार सुनवैत अत्यंत बृद्ध अपन काकी के संदेश पठवै छथिन) काकी भेजलहुं हैं कौआ के गाम यै                                 कनि बथुआ पठा देब पठादेव काकी सेरसो के साग यै                                 कनि पटुआ पठा देब । तिलकोरक पात भेजु, भेजू एरकंचन -2             भेज दिय’ मुंगरी माछ यै                                कन...

माधव कोना कठोर

          माधव   अहां  कोना  एहन  कठोर अहां  शीतल   श्रीखंड  छी  माधव हृदय  माखन  सन  उज्जर  कोमल आरक्त नयन अछि कमल द्वय तोर                  माधव अहां कोना एहन कठोर ! साउन   बितल  शरदो  चलि  गेल भरल   चातक  नयन  अछि  नोर ताम   झाम  संग   बसंत  अएला नाचैत  अछि  हमरो  मन  मे मोर                माधव अहां कोना एहन कठोर ! अछि  अहांक  कुंतल उमरल घुमरल भान  होइछ   सद्यहिं  बादल  जोर सुमन  सौरभि  सं  भरल पूरल अछि सुषमा  सं  आंचर  भरि  दिय'  मोर                   माधव अहां कोना एहन कठोर ! मज्जर  गमकै   छै  कोइली  कुहुकै सुर   पसरल   छै...

अव कोई क्या करे

चावल नकली है नहीं खाना शब्जी खाध वाली है नहीं खाना लोग बेइमान हैं बच के रहना करोना फैल रहा है हाथ मत मिलाना घर में बंद रहना पानी गंदा है नहीं पीना क्या करे मानव अव कहेंगे सांस मत लेना हवा जहरीली है जिंदा ही मर गया मानव! डॉ प्रमोद कुमार पांडिचेरी,04-03-2020