फिर से प्यार करो न(हिन्दी कविता)
फिर से प्यार करो न!
(पर्यावरण दिवस पर)
खुशियां समा नहीं रही थीं
दिल भी छोटा ,जगह भी कम!
जंगल में बैठा था ,मंत्र मुग्ध !
हिरण, भालू, गिलहरी
सभी आये
सूंघकर, स्वागत कर चले गये
पेड़ सिहड़े नहीं
बस हंस कर पंखा डुलाने लगे!
हवा कुछ हिचकी
फिर शीतलता बिछा कर चलती बनी!
दूर पहाड़ हंस रहे थे
नदियां कल कल करना छोर
जैसे गुमसुम खड़ी थी!
क्षुब्ध!
पक्षी मेरे बाल नोच कर चले जाते थे
आज मेरे पास कोई ठहरता क्यों नहीं
मृत प्राणी समझ सूंघकर
या बस छूकर
चले जाते हैं सब
क्यों!
आज तक ऐसा तो नहीं हुआ
मुझे देखकर सभी कितना हुलस जाते थे!
मित्र समझते थे
आज क्यों बिदक रहे हैं!
भरे दिल, वापस जा रहा था
एक तीन-चौथाई कटा पेड़ मिला
बोला भागो यहां से
या तो मेरे गिरने से मरेगा
या फिर गिराये जाने से!
पगला कहीं का!
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 05-06-2019
(चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से)
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