विषपिपरी (मैथिली कविता)
बिसपिपरी
एगो बुच्ची
मसोमातक बेटी
ने आगु नाथ ने पाछू पगहा
बुद्धिक तेज
मुदा लोहर चुट्टी!
घरे घरे काज क’
काटै छै दिन
बड्ड मुंह फट्ट
बाजै छै सच
कनिञां होथु ,कि कनिञां काकी
सभक भितरका बात ओ जनैत छै
ढ़ाकिक ढ़ाकी!
कियो बैसावै ,कियो भगावै
नोन मिरचाई सानि ,बात बढ़ावै
नित नियम सं झगड़ा लगावै
कखनो कोनटा पर
त’ कखनो चिनवार लग
अपन फीस वसुलैया’
कनिञां सभ सं टाका
बुढ़िया सभ सं ,चाउर आ दालि
युग युग के बात ई
नोन मिरचाई लगा ,परसने फिरै या'
साउस बहु लड़ैया ,ननदि कनैया
ई बिषपिपरी ,घी पिवैया’।
प्रमोद कुमार उर्फ नेहरू लाल दास
पांडिचेरी 31-05-2019
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