उड़ गई खुशी(हिन्दी लघु कथा)

        

मदन कालेज नहीं जा रहा था। यूनिवर्सिटी परीक्षा का फोर्म भड़ा जा रहा था। मदन के पास पैसे नहीं थे। सोच लिया था कि बस अव बहुत हुआ। हजारों लोग मैट्रिक पास हैं। मैं भी उनमें जुड़ जाऊंगा और क्या। लेकिन मां नहीं मानी बोली, “ जाकर पता तो कर के आ । कितना पैसा लगेगा।“
                              मदन अभी कालेज से कुछ दूर ही था कि अजित दौड़ता हुआ उसके पास आया और हांफते हुए बोला,” कहां रह गये थे तुम मदन। सभी तुम्हें खोज रहे थे। प्रिंसिपल साहब भी पूछ रहे थे। कल फोर्म भरने का अंतिम दिन है और तुम्हारा कुछ पता नहीं। जानते हो टेस्ट परीक्षा में तुम फर्स्ट किये हो” । “नहीं नहीं ! मैं कैसे फर्स्ट कर सकता हूं। “  किसी तरह से द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक पास किया था। लोग यह कहकर एडमिशन नहीं करा रहे थे कि यह पढ़ने वाला लड़का नहीं। वैसे जैसे ही प्रिंसीपल साहब ने घोषणा की कि जो फर्स्ट, सेकेन्ड और थर्ड करेगा उसे क्रमश: तीस, पचीस और पन्द्रह रुपये इनाम में दिये जाएंगे, मैं ने पूरी ईमानदारी से पढ़कर परीक्षा दी थी। फिर भी फर्स्ट करना…! नहीं… नहीं ,मेरे वश की बात नहीं।
लेकिन यह सच था। कुल एक सौ बीस रपये लगते थे फोर्म भरने में, छात्रवृत्ति के रूप में आधा फीस माफ थी। तीस रूपये ईनाम में मिले। फिर भी तीस रुपये कम पड़ते थे। एक शिक्षक को पता चला तो वे उसे प्रिंसिपल के पास ले गये। प्रिंसिपल ने बांकी के तीस रुपये भी माफ कर दिये । मदन की खुशी का ठिकाना न था।
गांव जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। संयोग से उसके बड़े भाई मिल गये। उत्साहित मदन ने अपने भाई से कहा,” टेस्ट परीक्षा में मैं ने फर्सट किया है। मुझे तीस रुपये इनाम में मिले”! छूटते ही बड़े भाई ने पूछा, “ चोरी चली थी क्या?”

डॉ प्रमोद कुमार
पांडिचेरी,19-06-2020 
Story

Comments